Sunday, May 26, 2019

राहुल गांधी: क्या ये गांधी परिवार की राजनीति का अंत है?

गुरुवार को जब भारतीय आम चुनावों के नतीजे आए तो नरेंद्र मोदी इकतरफ़ा जीते के साथ विजेता के तौर पर उभरे. दूसरी ओर नेहरू-गांधी परिवार के उत्तराधिकारी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी एक पस्त, पराजित और हताश नेता के रूप में उभरे.
वो एक परम राजनीतिक वंश के मुख्य उत्तराधिकारी हैं. उनके परनाना, जवाहर लाल नेहरू भारत के पहले और सबसे ज़्यादा समय तक रहे प्रधानमंत्री हैं. उनकी दादी इंदिरा गांधी भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री थीं और उनके पिता राजीव गांधी भारत के सबसे युवा प्रधानमंत्री थे.
साल 2014 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने अपनी सबसे बुरी हार देखी थी. लेकिन गुरुवार को आए नतीजे राहुल गांधी के लिए दोहरा झटका लेकर आए. कांग्रेस सिर्फ़ 52 सीटें ही जीत सकीं. उनके मुकाबले में मोदी की भाजपा ने 300 से ज़्यादा सीटें जीतीं. इससे भी बुरा ये हुआ कि राहुल गांधी अपनी खानदानी सीट अमेठी भी हार बैठे.
हालांकि राहुल गांधी इस बार भी संसद में बैठेंगे क्योंकि वो केरल की वायनाड सीट से भी खड़े हुए थे और यहां से वो जीत गए हैं.
लेकिन अमेठी सम्मान की लड़ाई भी थी. इस सीट से उनके दोनो अभिभावक- मां सोनिया गांधी और पिता राजीव गांधी ने चुनाव लड़ा और जीता. वो स्वयं यहां से पंद्रह सालों से सांसद थे. राहुल गांधी ने अमेठी के प्रत्येक घर में एक विशेष पत्र भी भेजा था जिस पर लिखा था मेरा अमेठी परिवार. बावजूद उसके उन्हें शर्मनाक नतीजे का सामना करना पड़ा. अभिनेत्री से राजनेता बनीं बीजेपी की केंद्रीय मंत्री स्मृति इरानी ने उन्हें करारी शिकस्त दी.
अमेठी उत्तर प्रदेश के दिल सी है. उत्तर प्रदेश भारत का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है और दिल्ली की सत्ता का रास्ता यहीं से होकर जाता है. ये भारतीय राजनीति का ग्राउंड ज़ीरो भी हैं जहां किए गए प्रयोगों का असर पूरे देश में दिखाई भी देता है. आमतौर पर ये माना जाता रहा है कि जो यूपी जीतता है वही देश पर राज करता है.
भारत में हुए चौदह प्रधानमंत्रियों में से आठ यहीं से आए जिनमें राहुल गांधी के परनाना, दादी और पिता भी यहीं से जीते और प्रधानमंत्री बनें. 543 सांसदों की भारतीय संसद में से 80 सांसद यहीं से चुने जाते हैं.
मूल रूप से गुजरात के नरेंद्र मोदी ने भी साल 2014 में यूपी की ही वाराणसी सीट का प्रतिनिधित्व किया और इस बार भी वो यहीं से सांसद चुने गए हैं.
किसी को ये उम्मीद तो नहीं थी कि कांग्रेस लोकसभा चुनावों में सीधी जीत हासिल कर लेगी लेकिन ये माना जा रहा था कि कांग्रेस पहले से बेहतर तो करेगी ही. यही वजह है कि नतीजों ने पार्टी के लोगों के अलावा आम लोगों को भी चौंका दिया है.
राहुल गांधी भले ही संसद में रहे लेकिन अब ये सवाल पूछा जाने लगा है कि क्या ये कांग्रेस में गांधी युग का अंत है. या क्या पार्टी को फिर से पुनर्जीवित करने के लिए गांधी परिवार की राजनीति को ख़त्म ही कर दिया जाए.
हार के बाद राहुल गांधी ने पत्रकारों को संबोधित किया और हार की पूरी ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ली. उन्होंने हार स्वीकार करते हुए बीजेपी को मिले जनादेश का सम्मान किया.
अमेठी में वोटों की गिनती पूरी भी नहीं हुई थी. तीन लाख वोट और गिने जाने बाकी थे लेकिन उन्होंने हार स्वीकार करते हुए स्मृति से कहा- अमेठी का ख्याल रखना.
"मैं उन्हें मुबारकबाद देता हूं. वो जीत गई हैं. ये प्रजातंत्र हैं और मैं लोगों के फ़ैसले का सम्मान करता हूं."
कांग्रेस की हार पर उन्होंने ज़्यादा बाद नहीं की. उन्होंने कहा कि कहां ग़लती हुई इस बात पर चर्चा कांग्रेस की वर्किंग कमेटी की बैठक में की जाएगी.
उन्होंने कांग्रेस कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि उम्मीद न हारें. उन्होंने कहा, "डरने की ज़रूरत नहीं है, हम मेहनत करते रहेंगे और अंततः जीत हमारी ही होगी."
लेकिन लखनऊ में कांग्रेस के दफ़्तर में बैठकर टीवी से चिपकर कांग्रेस का 'कत्ल-ए-आम', जिसमें एक बाद एक कई बड़े नेता अपनी सीटें हारते जा रहे थे, देख रहे चुनिदां कार्यकर्ताओं के राहुल गांधी की भविष्य की ये जीत दूर की कौड़ी दिखाई देती है.
पार्टी के एक नेता ने कहा, "हमारी विश्वसनीयता बहुत घट गई है. लोगों को हमारे वादों पर भरोसा नहीं है. हम जो कह रहे हैं उस पर वो विश्वास नहीं कर रहे हैं."
"मोदी ने लोगों से जो वादे किए पूरे नहीं किए लेकिन फिर भी लोग मोदी का भरोसा करते हैं."
उन्होंने कहा, "हमें भी नहीं पता कि ऐसा क्यों हैं!"
चुनावी राजनीति में कांग्रेस के इस बेहद ख़राब प्रदर्शन से राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठने तय हैं और बहुत से विश्लेषक नेतृत्व बदलाव की बात भी करने लगे हैं. अध्यक्ष पद से उनका इस्तीफ़ा तक मांगा जा रहा है. लेकिन इस तरह की सभी मांगें पार्टी के बाहर से उठ रही हैं और पार्टी नेतृत्व इन्हें नकार ही देगा.
दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में ये चर्चा भी चली कि राहुल गांधी ने इस्तीफ़ा देने की पेशकश की है. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर ने बीबीसी से कहा, "कांग्रेस अपने नेतृत्व पर सवाल नहीं करेगी और अगर राहुल गांधी ने इस्तीफ़ा दिया भी तो उसे स्वीकार नहीं किया जाएगा."
अय्यर ने कहा कि पार्टी की हार के लिए नेतृत्व ज़िम्मेदार नहीं है. उन्होंने कहा, "हार के कारण अन्य हैं जिन पर हमें काम करना होगा."
लखनऊ में पार्टी के प्रवक्ता ब्रिजेंद्र कुमार सिंह समझाते हुए कहते हैं कि समस्या पार्टी का नेतृत्व नहीं है बल्कि अंदरूनी लड़ाई और ग़लत चुनावी मुद्दे चुनना हैं.
"पार्टी के ढांचे में कुछ कमज़ोरियां हैं. नेताओं में अंदरूनी लड़ाई भी है. ज़मीन पर हमारा चुनावी अभियान भी देरी से शुरू हुआ. हमारे प्रयास, भले ही नाकाम रहे, लेकिन यूपी और बिहार में क्षेत्रीय दलों के साथ मिलना एक ख़राब विचार था."
कांग्रेस के नेताओं ने अभी तक इस हार के लिए राहुल गांधी को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया है बल्कि वो इसके लिए पार्टी के ढांचे और चुनाव अभियान को ज़िम्मेदार ठहराते हैं.
निजी बातचीत में कांग्रेस के कई विश्लेषक ये भी मान लेते हैं कि मोदी के सामने व्यक्तित्व की स्पर्धा में राहुल गांधी हार रहे थे. ब्रांड मोदी उनके रास्ते की सबसे बड़ी रुकावट था.
सिंह कहते हैं, "प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले चुनावों में जो वादे किए थे भले ही वो उन्हें पूरा करने में नाकाम रहे हे बावजूद इसके वो अपनी सरकार की नीतियों के बारे में लोगों को भरोसे में लेने में कामयाब रहे."
ये पहली बार नहीं है जब मोदी के हाथों राहुल गांधी को इतनी बुरी हार मिली हो. 2014 के चुनावों में पार्टी को सिर्फ़ 44 सीटें ही मिली थी. लेकिन उस वक़्त भी राहुल को पूरी तरह ज़िम्मेदार नहीं ठहराया गया था.
इसके बाद हुए कई विधानसभा चुनावों में कई राज्यों में राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा. राहुल की ये कहकर आलोचना की गई कि वो ज़मीनी हक़ीक़त से दूर हैं और उन्हें कुछ भी नहीं पता है. सोशल मीडिया पर उन्हें पप्पू तक कहा गया, उनके मीम्स बनाए गए और वो हंसी का पात्र बनकर रह गए.
एक सामान्य परिवार से आने वाले नरेंद्र मोदी राहुल गांधी के वंश को लेकर उन पर लगातार निशाना साधते रहे. वो उन्हें अपनी रैलियों में नामदार कहकर संबोधित करते रहे. मोदी जनता को समझाते कि राहुल गांधी शीर्ष पर अपनी योग्यता के बल पर नहीं बल्कि अपने पारिवारिक संबंधों की वजह से पहुंचे हैं.
निजी बातचीत में कांग्रेस के कई कार्यकर्ता राहुल गांधी को एक ऐसा सरल व्यक्ति बताते हैं जिसके पास अपने चालाक प्रतिद्वंद्वी से निबटने की न इच्छा है और न ही चालाकी. तो क्या इसे सिर्फ़ राहुल गांधी की नाकामी माना जाए या गांधी ब्रांड की नाकामी?
भारतीय राजनीति में चमकते रहे नेहरू-गांधी नाम की चमक हाल के सालों में कुछ फीकी पड़ी है. ख़ासकर शहरी मतदाताओं और युवाओं ने इस नाम को ख़ारिज कर दिया है. नेहरू और इंदिरा गांधी के कार्यकला की उपलब्धियां उनके लिए अब कोई मायने नहीं रखते हैं.
वो कांग्रेस को साल 2004-2014 के शासनकाल से आंकते हैं. इस दौरान कांग्रेस के नेतृत्व की गठबंधन सरकार पर भ्रष्टाचार के कई गंभीर आरोप लगे. गुरुवार के नतीजों से लगता है कि कांग्रेस पर लगे ये आरोप अभी भी लोगों के ज़ेहन में ताज़ा हैं और वो उसे इसी नज़रिए से देखते हैं. राहुल गांधी अपने नज़रिए से भी आम मतदाताओं को नहीं जोड़ पाए.

Tuesday, May 14, 2019

अब ईरान को कौन बचाएगा, भारत से कैसी उम्मीदें

अमरीका ने ईरान से भारत को तेल ख़रीदने पर प्रतिबंधों में छूट दे रखी थी. ईरान पर अमरीका ने प्रतिबंधों को और कड़ा किया तो एक मई को यह छूट ख़त्म कर दी.
इस संकट के बीच ईरान के विदेश मंत्री मोहम्मद जावेद ज़रीफ़ सोमवार की देर रात नई दिल्ली पहुंचे हैं. ज़रीफ़ भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से मुलाक़ात करेंगे.
भारत को ईरान से तेल ख़रीदने पर मिली अमरीकी छूट ख़त्म होने का मतलब यह हुआ कि भारत चाहकर भी ईरान से तेल नहीं ख़रीद सकता है.
अगर भारत अमरीका के ख़िलाफ़ जाकर ईरान से तेल ख़रीदता है तो भारत पर अमरीका कई तरह का प्रतिबंध लगा सकता है. ज़रीफ़ और सुषमा स्वराज की मुलाक़ात में अमरीकी प्रतिबंधों से निपटने पर बातचीत हो सकती है.
दोनों नेताओं के बीच चाबाहार पोर्ट पर भी बात होगी क्योंकि अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप ने इस मामले में छूट कायम रखी है.
2019 में ज़रीफ़ का यह दूसरा भारत दौरा है. विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अभी अमरीका के ख़िलाफ़ नहीं जा सकता है. हाल ही में अमरीका ने आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के संस्थापक मसूद अज़हर को संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद से वैश्विक आतंकवादी घोषित कराने में खुलकर मदद की थी.
ईरानी तेल का भारत, चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा ख़रीदार है. अमरीकी प्रतिबंधों के बाद भारत ने इसमें कटौती कर दी थी और हर महीने 1.25 मिलियन टन की सीमा तय कर दी थी. 2017-18 में भारत ईरान से प्रतिवर्ष 22.6 मिलियन टन तेल ख़रीद रहा था.
पिछले गुरुवार को अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की शीर्ष के अधिकारियों के साथ बैठक हुई थी. कार्यकारी रक्षा मंत्री पैट्रिक शैनहन ने मध्य-पूर्व में अमरीकी सेना की योजना को पेश किया था. मध्य-पूर्व में अमरीका बड़ी संख्या में सैनिक भेजने पर गंभीरता से विचार कर रहा है. न्यू यॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार अमरीका मध्य-पूर्व में एक लाख 20 हज़ार सैनिक भेजने पर विचार कर रहा है और यह संख्या 2003 में अमरीका ने जब इराक़ पर हमला किया था, उसी के बराबर है.
क्या ट्रंप ईरान में सत्ता परिवर्तन करना चाहते हैं? इस पर ट्रंप का कहना है, ''हमलोग देख रहे हैं कि ईरान के साथ क्या होता है. अगर वो कुछ करते हैं तो उनकी यह बड़ी भूल होगी.''
भारत और ईरान के बीच दोस्ती के मुख्य रूप से दो आधार बताए जाते हैं. एक भारत की ऊर्जा ज़रूरतें हैं और दूसरा ईरान के बाद दुनिया में सबसे ज़्यादा शिया मुसलमानों का भारत में होना.
ईरान को लगता था कि भारत सद्दाम हुसैन के इराक़ के ज़्यादा क़रीब है क्योंकि अब तक भारत सबसे ज़्यादा तेल आयात इराक़ से करता आया है. गल्फ़ को-ऑपरेशन काउंसिल से आर्थिक संबंध और भारतीय कामगारों के साथ प्रबंधन के क्षेत्र से जुड़ी प्रतिभाओं के कारण अरब देशों से भारत के मज़बूत संबंध कायम हुए हैं.
भारत की ज़रूरतों के हिसाब से ईरान से तेल आपूर्ति कभी उत्साहजनक नहीं रही. इसके मुख्य कारण इस्लामिक क्रांति और इराक़-ईरान युद्ध रहे.
भारत भी ईरान से दोस्ती को मुक़ाम तक ले जाने में लंबे समय से हिचकता रहा है. 1991 में शीतयुद्ध ख़त्म होने के बाद सोवियत संघ का पतन हुआ तो दुनिया ने नई करवट ली. भारत के अमरीका से संबंध स्थापित हुए तो उसने भारत को ईरान के क़रीब आने से हमेशा रोका.
इराक़ के साथ युद्ध के बाद से ईरान अपनी सेना को मज़बूत करने में लग गया था. उसी के बाद से ईरान की चाहत परमाणु बम बनाने की रही है और उसने परमाणु कार्यक्रम शुरू भी कर दिया था.
अमरीका किसी सूरत में नहीं चाहता था कि ईरान परमाणु शक्ति संपन्न बने और मध्य-पूर्व में उसका दबदबा बढ़े. ऐसे में अमरीका ने इस बात के लिए ज़ोर लगाया कि ईरान के बाक़ी दुनिया से संबंध सामान्य न होने पाएं.

Friday, May 3, 2019

يحذر الخبراء من إمكانية أن تتسرب الأخطاء إلى عملية إعداد التقارير الخاصة بالفجوة

في العام الماضي تعرضت الكثير من الشركات الكبرى العاملة في مجال المحاماة وتقديم الخدمات المهنية - مثل المحاسبة والتدقيق والخدمات الهندسية وغيرها - لهجوم ضارٍ لادعائها بأن أصحاب الدخول الأعلى فيها، والذين يتألف غالبيتهم من الذكور، هم من "مُلاك" المؤسسة لا من "الموظفين" فيها، وهو ما يسمح بعدم وضعهم في الاعتبار، عند إجراء الحسابات الخاصة بتحديد حجم الفجوة القائمة بين أجور الرجال والنساء.
وفي وقت لاحق، رضخت تلك الشركات للضغوط الحكومية، وأعادت تصحيح أرقامها لكي تتضمن الرواتب التي يحصل عليها هؤلاء الأشخاص. رغم ذلك، فلا يزال لدى البعض منها مستشارون يتقاضون أجورا مرتفعة، دون أن يُدرجوا على كشوف رواتب الموظفين، لأن إدارات تلك الشركات تعتبر أن أولئك الأشخاص متعاقدون أو مستشارون من الخارج.
اللافت أن تضمين هذه الأرقام غير كاف، إذ أن الآليات الخاصة بالتحقق من دقة ما تنشره تلك الشركات لا تزال محدودة للغاية.
وفي العام الماضي، أجرت صحيفة "فاينانشال تايمز" تحقيقا استقصائيا أظهر أن واحدا من كل 20 تقريرا متعلقا بالفجوة في الأجور بين الجنسين تضمن بيانات غير محتملة الحدوث من الوجهة الإحصائية، وهو ما يرجح كونه غير دقيق.
فعلى سبيل المثال، ادعت 16 شركة أنها تدفع الراتب نفسه في المتوسط لموظفيها وموظفاتها دون تفرقة، وهو ما يعني انعدام الفجوة في الأجور بين الجنسين. غير أن الكثير من هذه الشركات - وبينها أسماء كبرى - أعادت تصحيح بياناتها وأرقامها في هذا الشأن.
وفي العام الجاري، أفصحت مئات الشركات عن بيانات لا تبدو محتملة بدورها من الناحية الإحصائية.
ورغم أنه يوجد في بريطانيا مفوضية حكومية تتولى المسؤولية عن تطبيق القانون الخاص بالكشف عن حجم الفجوة بين الرجال والنساء في الرواتب، فإن هيلين ريردون بوند تقول إن الصلاحيات الممنوحة لهذه المفوضية "عفا عليها الزمن إلى حد بعيد" ما يجعلها غير ملائمة للوفاء بمتطلبات عملية تحديد هذه الفجوة ونشر تفاصيلها.
وربما يجدر بنا الآن الاطلاع على رأي تشارلز كوتون، الخبير الاستشاري البارز في شؤون الأجور والمكافآت في معهد تشارتارد للأفراد والتنمية في المملكة المتحدة، وهو المعهد الذي يوفر للحكومة البريطانية أدلة ومعطيات تخص قضايا قانونية ترتبط بالأجور ومسألة إحالة العاملين إلى التقاعد، وملف رواتب التقاعد كذلك.
ويقول كوتون إنه يشعر بالقلق حيال مدى توخي الشركات الدقة حيال ملف التفاوت في الرواتب بين العاملين والعاملات فيها، رغم أنه يقر بأنه لم يطلع حتى الآن على أي أدلة تثبت تورط هذه المؤسسات في عملية التلاعب ببياناتها.
ويشير كوتون إلى أنه من السهل أن تتسلل الأخطاء إلى عملية إعداد التقارير الخاصة بهذا الأمر، خاصة إذا لم يكن هناك تنسيق بين الأقسام ذات الصلة بذلك الملف.
لكن البعض يتهمون الشركات والمؤسسات بأنها تكتفي بإبداء الاحترام الظاهري للقانون المطبق في هذا الشأن، دون القيام بأي إجراءات عملية للالتزام به.
شهدت السنوات الأخيرة تحول عشرات من المستثمرين الكبار في العالم، خاصة من العاملين في مجال إدارة الأصول في فرنسا، للتركيز على الاستثمار في صناديق تتوخى المسؤولية الاجتماعية، وتتجنب ضخ الأموال في الشركات التي تبيع المشروبات الكحولية والتبغ، أو تروج للمقامرة والحروب، أو تسهم في إحداث أضرار بيئية.
ومن الممكن أن يصبح ضمان وجود تنوع في قوة العمل في الشركات والمؤسسات هو الهدف التالي اللازم تحقيقه، إذا ما كنا نتحدث عن المعايير الأخلاقية التي يتم من خلالها تقييم الاستثمارات التي تقوم بها رؤوس الأموال الكبرى.
وفي فبراير/شباط الماضي، قالت مجموعة "هيرميس لإدارة صناديق الاستثمار"، وهي شركة استثمارية بارزة تتخذ من المملكة المتحدة مقرا لها، إنها ستتخذ موقفا أكثر صرامة من الشركات والمؤسسات التي لا تضمن التمثيل المتكافئ للرجال والنساء في مجالس إداراتها أو لجانها التنفيذية، وهو أمر قد تحذو شركات أخرى حذوه.
ويشير تشارلز كوتون إلى أن دولا مثل فرنسا وألمانيا تشكل نموذجا إيجابيا، على صعيد تحسين مستوى الشفافية ومن ثم إحداث التغييرات المنشودة على صعيد تقليص التفاوت بين الجنسين في الرواتب.
ويضيف: "بوسع أي موظف في ألمانيا أن يطلب مقارنة راتبه برواتب ستة من الموظفين المناظرين له ولكن من الجنس الآخر. وبمقدور الأفراد اللجوء إلى المحاكم إذا شعروا بأنهم يتعرضون للتمييز. ورغم أن ذلك لم يُستغل حتى الآن سوى من جانب عدد محدود من الأشخاص، فمن المرجح أن يتغير هذا الوضع مع تزايد عدد من يعرفون بتوافر مثل هذه الفرصة لهم".
أما في فرنسا، فيتم تقييم الشركات التي يصل عدد موظفيها إلى ألف شخص أو أكثر، على مقياس مؤلف من مئة درجة، بحسب مدى توافقها مع معايير من بينها تقليص الفجوة في الأجور بين الجنسين وآليات الترقي المتبعة فيها.
وتُمنح الشركات التي يقل معدلها في هذا الشأن عن 75 في المئة ثلاث سنوات لتحسين تصنيفها، وما لم تنجح في ذلك تفرض عليها غرامة تصل إلى واحد في المئة من قيمة الرواتب التي تمنحها.
كما أعلنت فرنسا أنها ستستحدث برنامج كمبيوتر خاصا لمراقبة كشوف الرواتب لدى الشركات المختلفة، للتعرف على مدى التفاوت في الأجور بين الجنسين.
وبحسب هيلين ريردون بوند المستشارة السابقة لدى الحكومة البريطانية، تتبوأ الدول الإسكندنافية مكانة متميزة على صعيد تقليص هذه الفجوة، من خلال ما توفره من رعاية شاملة للأطفال، وما هو موجود فيها من فرص للآباء والأمهات لنيل إجازة للعناية بالمواليد الجدد.
وتقول بوند إن مثل هذه الأمور تُحدث فارقا لأن الفجوة في الرواتب بين الجنسين غالبا ما تكون أكثر وضوحا وبروزا عندما تحصل الموظفات على عطلات ينقطعن فيها عن العمل من أجل تكوين أسرة.
وبالعودة إلى المملكة المتحدة، سنجد كوتون يعرب عن رغبته في وضع خطة متماسكة تستهدف تحقيق تقدم على صعيد تقليص أي تفاوت في الأجور بين الجنسين، ما يفسح المجال نحو مساءلة الشركات عن أدائها في هذا المضمار على نحو أكبر.
وينتقد كوتون مواصلة نحو ثلث الشركات تقديم البيانات الخاصة بذلك التفاوت، بدون تفسير للأرقام التي تتضمنها، وبمعزل عن البيانات الأخرى المتعلقة بعملها، قائلا إن تقليص تلك الفجوة يتطلب من أرباب العمل مراجعة "دورة حياة التوظيف والتشغيل" بأكملها.
ويضيف أن ذلك يعني "دراسة وفحص الممارسات المتعلقة بتوظيف عمال جدد والخاصة بالإبقاء على العمال الموجودين بالفعل في داخل المؤسسة، وكذلك تلك السياسات المرتبطة بالإدارة والتدريب والتطوير ومنح مكافآت وتقدير جهود الموظفين، جنبا إلى جنب مع مراجعة تصميم هيكل المؤسسة وطبيعة العمل فيها والوظائف أيضا".
ويقول كوتون إن "تحقيق تقدم طفيف في كل من هذه المجالات على حدة، قد يؤدي إلى فارق كبير بشكل عام".