Tuesday, October 8, 2019

भूपिंदर सिंह हुड्डा बीजेपी के विजय रथ को चुनौती दे पाएंगे?

हरियाणा के आगामी विधानसभा में मनोहर लाल खट्टर की अगुवाई वाली बीजेपी के विजय रथ को कोई चुनौती दे सकता है, तो वो हैं देसवाली के नेता, 72 बरस के भूपिंदर सिंह हुड्डा.
भूपिंदर सिंह हुड्डा 2005 से 2014 तक हरियाणा के मुख्यमंत्री रहे थे. इस दौरान हुड्डा ने एक तरफ़ तो ख़ुद को राज्य के क़द्दावर जाट नेता के तौर पर स्थापित किया. साथ ही साथ उन्होंने रोहतक और आस-पास के तीन जाट बहुल ज़िलों को अपने गढ़ के तौर पर भी विकसित किया.
रोहतक, झज्जर और सोनीपत के जाटों को हुड्डा के दस साल के शासन काल में ऐसा वीआईपी दर्जा हासिल था कि उन्हें सरकारी नौकरियों में मनमर्ज़ी की पोस्टिंग मिलती थी. हर विकास कार्य में उन्हें तरजीह मिलती थी. इससे राज्य के बाक़ी 19 ज़िलों के लोग पुराने रोहतक के जाटों से जलते भी थे.
इलाक़े के बुज़ुर्ग यानी ताऊ, भूपिंदर सिंह हुड्डा को इस बात का श्रेय देते हैं कि उन्होंने पुराने और अविकसित रोहतक को चंडीगढ़ की तर्ज़ पर एक आधुनिक शहर बनाने की दिशा में बहुत काम किया. हुड्डा की कोशिशों से रोहतक की सड़कें, रोडलाइट और बुनियादी ढांचे में बहुत सुधार आया.
भूपिंदर सिंह हुड्डा के दस साल के शासन काल के दौरान, पुराने रोहतक के मतदाताओं को सरकारी नौकरियों में ख़ूब मौक़े मिले. उन्हें उनकी मन की पोस्टिंग भी मिल जाती थी. और राज्य सरकार के मुख्यालय तक उनकी पहुंच रोहतक के लोगों के लिए ख़ुद भी एक नया तजुर्बा था. और उन्होंने इसका भरपूर उपयोग भी किया.
हालांकि 2005 से पहले हुड्डा की इकलौती शोहरत ये थी कि उन्होंने पूर्व उप-प्रधानमंत्री और बेहद लोकप्रिय क़द्दावर जाट नेता देवीलाल को तीन बार रोहतक लोकसभा सीट से हराया था.
इससे पहले का दौर ऐसा था कि राज्य के मुख्यमंत्री की कुर्सी बागरी के नेताओं की जागीर मालूम होती थी. पहले देवीलाल मुख्यमंत्री बने. फिर उनके बेटे ओम प्रकाश चौटाला ने पद संभाला. इनके अलावा भजन लाल और बंसी लाल मुख्यमंत्री बने तो वो भी बागरी के ही थे. लेकिन, पुराने रोहतक या देसवाली पट्टी के लोगों को कभी भी ये मौक़ा नहीं मिला कि उनके बीच का कोई नेता मुख्यमंत्री बने.
नतीजा ये रहा कि कृषि बहुल हरियाणा के रोहतक पट्टी के लोगों को राज्य के संसाधनों पर भी वाजिब हक़ नहीं मिला.
हालांकि, हरियाणा के अलग राज्य के तौर पर गठन के बाद से ही रोहतक राज्य की राजनीतिक गतिविधियों का गढ़ रहा था. देवीलाल जैसे बड़े नेताओं ने रोहतक को अपनी कर्मभूमि बनाया और सियासी कामयाबी का फल चखा. लेकिन, इसका फ़ायदा रोहतक के वोटरों को नहीं मिला.
सत्ता के गलियारों में पहुंच की रोहतक की जनता की ललक भूपिंदर सिंह हुड्डा ने ही शांत की.
'हरियाणा की पॉवर पॉलिटिक्स' नाम की किताब के लेखक भीम एस दहिया कहते हैं कि हरियाणा की जाट राजनीति में सबसे ज़्यादा ज़ोर इसी बात पर रहा कि राजनीति के अखाड़े में जाटों का प्रभुत्व बना रहे. जाटों के लिए किसी पार्टी की कोई अहमियत नहीं है. बस वो राज्य की सियासत पर हावी रहना चाहते हैं.
जैसे ही उन्हें प्रभुत्व को चुनौती मिलती है या कोई पार्टी उन्हें सियासी हैसियत में पहली पायदान से नीचे रखती है, तो वो उस पार्टी का साथ छोड़ देते हैं. या फिर वो उस पार्टी को ही तोड़ देते हैं. लेकिन, वो कभी भी दोयम दर्जे की हैसियत लंबे समय के लिए मंज़ूर नहीं करते.
भूपिंदर सिंह हुड्डा अपने परिवार में तीसरी पीढ़ी के कांग्रेसी नेता हैं. उन्होंने जाटों के वोट बैंक को एकजुट किया. हुड्डा ने इसके लिए ग़ैर जाट वोटों को एकजुट करने के पूर्व मुख्यमंत्री भजन लाल के सब को ख़ुश करने के फॉर्मूले का इस्तेमाल किया.
वरिष्ठ कांग्रेसी नेता सुभाष बत्रा रोहतक से कांग्रेस के पूर्व विधायक रह चुके हैं. वो 1991 की भजन लाल सरकार में गृह मंत्री भी रहे थे. बत्रा, पुराने दिनों को याद कर के कहते हैं कि 1991 से पहले भूपिंदर सिंह हुड्डा रोहतक की ज़िला अदालत में वकालत किया करते थे.
बत्रा बताते हैं कि उस दौर में हुड्डा अपने बचपन के सभी दोस्तों (जिन में उनके रिश्तेदार चंदर सेन दहिया के अलावा सभी ग़ैर जाट थे) के साथ रोहतक के मॉडल टाउन इलाक़े में ताश खेला करते थे. ये जगह हुड्डा के पुश्तैनी घर के क़रीब ही थी. इस दौरान चाय पर सियासी चर्चाएं भी हुआ करती थीं.
हुड्डा का ये तजुर्बा तब बहुत काम आया, जब उन्होंने चौधरी देवीलाल को चुनाव मैदान में पटखनी दी. शहरी वोटरों की पहली पसंद भूपिंदर सिंह हुड्डा ही थे. जबकि ग्रामीण मतदाता देवीलाल को तरजीह देते थे.
सुभाष बत्रा बताते हैं कि 1991 से पहले भूपिंदर सिंह हुड्डा, किलोई विधानसभा सीट से चुनाव हार गए थे. यहां तक कि उनके बड़े भाई कैप्टन प्रताप सिंह और पिता रनबीर सिंह भी अपने गृह क्षेत्र से चुनाव नहीं जीत सके थे.
किलोई सीट से कांग्रेस के टिकट पर लगातार हारने के बाद सियासी गलियारों में ये चर्चा होती थी कि चूंकि रनबीर सिंह की कांग्रेस मुख्यालय में तगड़ी पैठ है. इसी वजह से बार-बार हारने के बाद भी उनके परिवार को ही टिकट मिल जाता है.
1980 के दशक में रोहतक के लोगों के लिए हुड्डा, उनके 'भूपी' थे, क्योंकि उनका बर्ताव बहुत विनम्रता भरा होता था. वो अपने पिता रनबीर सिंह की गाड़ी चलाया करते थे. रनबीर सिंह संयुक्त पंजाब की सरकार में मंत्री रहे थे. इसके अलावा उनकी पहुंच दिल्ली में सत्ता के गलियारों तक भी थी.
उन दिनों को याद करते हुए सुभाष बत्रा बताते हैं कि, 'रनबीर सिंह ने ही मुझे अपने बेटे भूपी वकील से मिलवाया था. रनबीर सिंह मुझे अपनी फिएट कार में बिठा कर ले गए थे. तब भूपिंदर सिंह हुड्डा ही कार चला रहे थे और उनके पिता पीछे की सीट पर बैठे थे. तब रनबीर सिंह ने मुझे हुड्डा से मिलवाया था.'
बत्रा बताते हैं कि रनबीर सिंह कहा करते थे कि यूं तो उनका बेटा भूपी बहुत सीधा है. लेकिन अगर वो एक बार कुछ ठान लेता है, तो फिर उसे रोकना बहुत मुश्किल होता है.
बत्रा कहते हैं, ''मैं आज भी हुड्डा के मामले में उनके पिता की बातों को सच होते देखता हूं. क्योंकि हुड्डा ने अपने कई ऐसे दोस्तों को बार-बार टिकट दिया, जो चुनाव नहीं जीत पाते थे. भूपी को दोस्तों को धोखा देने के बजाय हार मानना मंज़ूर था. क्योंकि वो यारों के यार हैं और संबंध निभाना जानते हैं.''
ये उस वक़्त की बात है जब भूपी उर्फ़ भूपिंदर सिंह हुड्डा, किलोई सीट से विधानसभा पहुंचने की ज़ोर-आज़माइश कर रहे थे. उस समय हुड्डा की लोकसभा चुनाव में कोई दिलचस्पी नहीं थी. लेकिन, उन्हें लोकसभा का चुनाव लड़ने के लिए उनके चचेरे भाई चौधरी वीरेंद्र सिंह ने राज़ी कर लिया.
चौधरी वीरेंद्र उस वक़्त हरियाणा प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष थे. उनके कहने पर भूपिंदर सिंह हुड्डा, चौधरी देवीलाल के ख़िलाफ़ रोहतक से लोकसभा का चुनाव लड़ने को राज़ी हो गए.
ताक़तवर बागरी नेता चौधरी देवीलाल के ख़िलाफ़ मैदान में उतरने के इस साहसिक फ़ैसले ने भूपिंदर हुड्डा की ज़िंदगी बदल दी. चुनाव प्रचार में हुड्डा ने रोहतक के मेहम में हुए हत्याकांड के मुद्दे को देवीलाल के ख़िलाफ़ ख़ूब भुनाया.
रोहतक के मतदाताओं की देवीलाल को वोट न देने की एक और वजह थी. और वो ये थी कि 1989 में देवीलाल ने रोहतक के अलावा राजस्थान की सीकर सीट से भी चुनाव लड़ा था. दोनों सीटें जीतने के बाद देवीलाल ने हरियाणा की रोहतक सीट के बजाय सीकर को चुना और रोहतक से इस्तीफ़ा दे दिया था.
उस वक़्त रोहतक के ग्रामीण इलाक़े के लोग देवीलाल की पूजा किया करते थे. लेकिन, देवीलाल के इस क़दम से वो छला हुआ महसूस कर रहे थे. उस वक़्त हुड्डा ने शहरी इलाक़ों में अच्छी पहचान बना ली थी. देवीलाल से लोगों की नाराज़गी का हुड्डा ने जमकर सियासी फ़ायदा उठाया.
1991 की ही तरह भूपिंदर हुड्डा ने 1996 और 1998 के लोकसभा चुनावों में भी देवीलाल को शिकस्त दे दी. हालांकि जीत-हार का अंतर बहुत कम था. लेकिन, देवीलाल जैसे क़द्दावर और बेहद लोकप्रिय नेता को लगातार तीन बार हराने की वजह से भूपिंदर सिंह हुड्डा की छवि एक ऐसे नेता की बन गई थी, जो रोहतक के पुराने सपने को पूरा कर सकते थे. और वो सपना था हरियाणा पर हुकूमत करने का.
1999 के लोकसभा चुनाव में हुड्डा को इंडियन नेशनल लोकदल के कैप्टन इंदर सिंह ने हरा दिया था. इंदर सिंह ने इसे मुख्यमंत्री ओपी चौटाला के पिता चौधरी देवीलाल को हराने का बदला क़रार दिया था. कैप्टन इंदर सिंह ने कहा कि केवल 1991 में भूपिंदर हुड्डा की देवीलाल पर जीत असली थी. क्योंकि, हुड्डा ने देवीलाल को 1996 में केवल 2266 वोट और 1998 में केवल 383 वोटों से हराया था.
कैप्टन इंदर सिंह का आरोप था कि हुड्डा को ये जीत धांधली से मिली थी.
इंदर सिंह ने आरोप लगाया कि देवीलाल को हराने के लिए उस वक़्त के मुख्यमंत्रियों, पहले बंसीलाल और फिर भजनलाल ने अपनी ताक़त का इस्तेमाल हुड्डा के पक्ष में किया था.
2004 में जब भूपिंदर सिंह हुड्डा एक बार फिर लोकसभा चुनाव जीते, तो उस वक़्त हरियाणा के मुख्यमंत्री भजनलाल थे. उन्हें ख़्वाब में भी गुमान नहीं था कि भूपिंदर सिंह हुड्डा उनके लिए कोई सियासी ख़तरा बनेंगे और भजनलाल को उनके ही सियासी खेल में मात दे देंगे.
चौधरी देवीलाल को तीन बार लोकसभा चुनाव में हराने के बाद भूपिंदर सिंह हुड्डा में इतना आत्मविश्वास आ गया था कि अब वो हरियाणा की राजनीति में पीएचडी करने का दावा करने वाले भजनलाल को चुनौती देने की स्थिति में पहुंच चुके थे.
अब भूपिंदर हुड्डा ने देसवाली चौधरी के मुख्यमंत्री बनने की वकालत ज़ोर-शोर से करनी शुरू कर दी थी. 'पॉलिटिक्स ऑफ़ चौधर' नाम की किताब लिखने वाले सतीश त्यागी कहते हैं कि भूपिंदर सिंह हुड्डा को 'ड्राइंग रूम पॉलिटिक्स' में महारत हासिल थी. संसद सदस्य होने की वजह से वो दिल्ली के कांग्रेस कल्चर को भी अच्छी तरह से समझ चुके थे.
कांग्रेस के पुराने दिग्गजों की तरह ही भूपिंदर सिंह हुड्डा भी देर रात तक जागते थे और लोगों से मिलते रहते थे. इस तरह उन्होंने गांधी परिवार के क़रीबी नेताओं का दिल जीत लिया था. रोहतक के लोगों से हुड्डा ये कहा करते थे कि वो बरास्ते दिल्ली, चंडीगढ़ पहुंचेंगे, यानी मुख्यमंत्री बनेंगे.
उस वक़्त प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के मददगार बनकर भजनलाल, सोनिया गांधी की नाराज़गी मोल ले चुके थे. वहीं, भूपिंदर सिंह हुड्डा ने अहमद पटेल और मोतीलाल वोरा जैसे नेताओ की मदद से सोनिया गांधी की कृपा हासिल कर ली थी.
जब 2005 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 67 सीटें जीतकर बहुमत से सत्ता में आई, तो ज़्यादातर विधायकों ने भजनलाल को मुख्यमंत्री बनाने का समर्थन किया. सोनिया गांधी ने पर्यवेक्षकों की एक टीम दिल्ली से चंडीगढ़ भेजी. इन पर्यवेक्षकों ने विधायकों से बात करके उनसे इस बात पर सहमति ले ली कि इस बार मुख्यमंत्री आलाकमान तय करेगा.
त्यागी बताते हैं कि तब सोनिया गांधी के विश्वासपात्र जनार्दन द्विवेदी को ये बात अच्छे से पता थी कि ज़्यादातर विधायक भजनलाल को मुख्यमंत्री बनाने के हक़ में हैं. लेकिन, उन्होंने हर विधायक से मुख्यमंत्री पद के लिए उसकी पसंद को निजी तौर पर काग़ज़ पर लिखवा लिया. और आख़िर में कहा कि सीएम कौन बनेगा, विधायक ये फ़ैसला सोनिया गांधी पर छोड़ दें.
वो 4 मार्च की सर्द सुबह थी. भजनलाल अपने समर्थक विधायकों के साथ दिल्ली में अपने आवास पर डटे हुए थे और इस बात का इंतज़ार कर रहे थे कि सोनिया गांधी, सीएम पद के लिए उनके नाम का ऐलान करें. लेकिन, शाम 4 बजते-बजते उनका सपना चकनाचूर हो चुका था. उस दिन शाम को हरियाणा के नए सीएम के तौर पर भूपिंदर सिंह हुड्डा के नाम का ऐलान हुआ.
अब हुड्डा को सीएम स्वीकार करने के अलावा विधायकों के पास कोई चारा नहीं था. जब उनके सामने ये साफ़ हो गया कि हुड्डा ही सोनि

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