Wednesday, October 30, 2019

विश्वनाथ प्रताप सिंह का दिया राज्य मंत्री का पद ठुकराया

आरंभिक झिझक के बाद उन्होंने जनता दल की सदस्यता ग्रहण कर ली. वो चंद्रशेखर के बहुत करीब हो गए. जब विश्वनाथ प्रताप सिंह सत्ता में आए तो उन्होंने उन्हें अपने मंत्रिमंडल में राज्यमंत्री के रूप में जगह दी, लेकिन उन्होंने इस पद को स्वीकार नहीं किया.
यशवंत सिन्हा याद करते हैं, 'जब मैं राष्ट्रपति भवन में घुसा तो मुझे कैबिनेट सचिव टीएन सेशन का लिखा एक पत्र दिया गया. उसमें लिखा था कि राष्ट्रपति ने मेरी राज्य मंत्री के तौर पर नियुक्ति की है. पढ़ते ही मेरा दिल बैठ गया.'
'मैंने 10 सेकेंड के अंदर फ़ैसला किया कि मैं इस पद को स्वीकार नहीं करूँगा. मैं तुरंत पलटा. अपनी पत्नी का हाथ पकड़ा और उससे दृढ़ आवाज़ में कहा, 'तुरंत वापस चलो.'
'पार्टी में मेरी वरिष्ठता को देखते हुए और चुनाव प्रचार में मैंने जिस तरह का काम किया था, वी पी सिंह ने मेरे साथ न्याय नहीं किया था. सबसे बड़ी बात ये थी कि मुझे जूनियर मंत्री का पद दे कर उन्होंने मेरे नेता चंद्रशेखर का भी अपमान किया था.'
इसके बाद जब चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने उन्हें वित्त मंत्री बनाया. लेकिन वो सरकार बहुत अधिक समय तक चली नहीं. सरकार गिरने के कुछ समय बाद उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ले ली जिसमें लाल कृष्ण आडवाणी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
यशवंत सिन्हा बताते हैं, 'चंद्रशेखर की समाजवादी जनता पार्टी समाप्ति की तरफ़ थी. उस समय मेरे पास दो विकल्प थे. एक था कांग्रेस और दूसरी भारतीय जनता पार्टी. नरसिम्हा राव बहुत चाहते थे कि मैं कांग्रेस में आऊँ. उनसे कई बार मुलाकात भी हुई. लेकिन मुझे कांग्रेस पार्टी में जाना अच्छा नहीं लगा.
एक 'कॉमन' मित्र ने मेरी मुलाकात आडवाणी जी से करवाई लेकिन पार्टी में जाने की कोई बात उनसे नहीं हुई. उसी ज़माने में जनता दल के सभी घटकों को एक करने की मुहिम भी चल रही थी.'
यशवंत सिन्हा आगे बताते हैं, ' एक दिन मैं और मेरी पत्नी हवाई जहाज़ से राँची से दिल्ली आ रहे थे. पटना में विमान में लालू प्रसाद यादव सवार हुए. मैंने उन्हें प्रणाम किया लेकिन उन्होंने प्रणाम का जवाब देना तो दूर मुझे पहचानने तक से इंकार कर दिया. दिल्ली में जब जहाज़ उतरा तो मेरे बगल में खड़े रहने के बावजूद उन्होंने मुझसे कोई बात नहीं की. मेरी पत्नी ने मुझसे कहा कि लालू ने आपकी बहुत उपेक्षा की है. लालूजी की इस हरकत को देखते हुए मैंने घर पहुंच कर तुरंत आडवाणीजी को फ़ोन कर कहा कि मैं आपसे तुरंत मिलना चाहता हूँ. कुछ दिनों बाद आडवाणी ने मुझे भारतीय जनता पार्टी में शामिल कर लिया और उन्होंने एक प्रेस कान्फ़्रेंस करके आलान किया कि मेरा बीजेपी में जाना पार्टी के लिए दीवाली गिफ़्ट है.'
1998 में जब भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आई तो आरएसएस ने जसवंत सिंह के मंत्री बनने पर आपत्ति की, क्योंकि वो चुनाव हार गए थे. तब यशवंत सिन्हा को वित्त मंत्री बनाया गया. बाद में वो जसवंत सिंह की जगह भारत के विदेश मंत्री बने.
उसी दौरान उन्हें वाजपेई प्रतिनिधिमंडल के साथ रूस जाने का मौका मिला. यशवंत सिन्हा याद करते हैं, 'हम लोग क्रेमलिन जा रहे थे. वहाँ दो स्तरों पर बातचीत होनी थी. एक तो वाजपेई और पुतिन के बीच आमने सामने की बातचीत होने वाली थी, जिसमें मैं और ब्रजेश मिश्रा दोनों रहने वाले थे.
ब्रजेश मिश्रा वाजपेई जी की गाड़ी में उनके साथ ही बैठ गए क्योंकि रास्ते में उन्हें उनसे बात करनी थी. दूसरी गाड़ी में मैं और रूस में भारत के राजदूत रघुनाथ बैठे. वाजपेई जी की गाड़ी तो सीधे चली गई. हम लोगों को किसी दूसरे गेट पर लाया गया. वहाँ पर उन्होंने हमें कार से उतार कर हमारी सुरक्षा जाँच की. फिर उन्होंने हमें एक जगह ले जा कर बैठा दिया. मैंने कहा कि हमें
यशवंत सिन्हा आगे कहते हैं, 'जब कश्मीर बहुत अशाँत हो गया था 2016 में तो हम कश्मीर गए थे एक समूह के साथ. मैं जब कश्मीर दोबारा गया दिसंबर, 2016 में तो मुझे लगा कि एक रास्ता निकल सकता है. मैंने श्रीनगर से ही प्रधानमंत्री कार्यालय के लिए फ़ोन लगा कर कहा कि मैं उने मिलना चाहता हूँ.'
'उसके बाद मैंने कई बार उनसे मिलने की कोशिश की. लेकिन उन्होंने मुझे कभी समय नहीं दिया. मैं गृह मंत्री से भी मिला. वहाँ से भी मुझे कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिला. जब मेरे अंदर सवाल उठा कि ये लोग कश्मीर में क्यों बातचीत और शाँति का रास्ता नहीं अपनाना चाहते?'
'फिर मैंने दो साल पहले भारत की आर्थिक स्थिति के बारे में इंडियन एक्सप्रेस में एक लेख लिखा था. अगर उस समय मेरी बात को सुना जाता तो भारतीय अर्तव्यवस्था की वो स्थिति नहीं होती जो आज है. लेकिन बात सुनने की बात तो दूर रही, मेरे बारे में कहा गया कि ये 80 साल की उम्र में नौकरी तलाश रहे हैं.'
बातचीत में शामिल होना है, लेकिन इसका उनके ऊपर कोई असर नहीं पड़ा.'
यशवंत सिन्हा आगे बताते हैं, ' मैंने अपने राजदूत रघुनाथ
यशवंत सिन्हा ने 2009 का चुनाव जीता, लेकिन 2014 में उन्हें बीजेपी का टिकट नहीं दिया गया. धीरे धीरे नरेंद्र मोदी से उनकी दूरी बढ़ने लगी और अंतत: 2018 में 21 वर्ष तक बीजेपी में रहने के बाद उन्होंने पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया.
यशवंत सिन्हा बताते हैं, 'हाँलाकि मैंने इस बात की हिमायत की थी कि मोदीजी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाया जाए लेकिन 2014 का चुनाव आते आते मुझे इस बात का आभास हो गया था कि इनके साथ चलना मुश्किल होगा. इसलिए मैंने तय किया कि मैं चुनाव लड़ूंगा ही नहीं.
पार्टी ने मेरी जगह मेरे बेटे को उस सीट का ऑफ़र दिया. वो जीते और मोदीजी ने उन्हें मंत्री भी बनाया. हाँलाकि अब वो मंत्री नहीं हैं 2019 का चुनाव जीतने के बाद भी. इसके बाद भी मैं मोदीजी को सुझाव देता रहा.
अलग अलग मुद्दों पर उन्हें पत्र लिखता रहा. हमारा उनका फ़ासला बढ़ा कश्मीर के मुद्दे को ले कर. मैं चाहता था कि काश्मीर में वाजपेई जी की नीतियों का अनुसरण हो. उनकी नीति थी इंसानियत, जमहूरियत और कश्मीरियत.
'मेरा मानता था कि कश्मीर में सभी संबंधित पक्षों से बातचीत की जाए. वाजपेई जी के समय में हुर्रियत तक से बातचीत हुई थी.'
से कहा कि आप तुरंत गाड़ी मंगवाइए. मैं वापस अपने होटल जाउंगा. हम लोग उस भवन से पैदल ही बाहर निकल लिए. हमने सोचा कि अगर हमारी कार नहीं भी मिली तो हम टैक्सी ले कर अपने होटल चले जाएंगे.
जब हम क्रेमलिन से वॉक आउट कर रहे थे तो दो रूसी पदाधिकारी दौड़ते हुए आए. वो माफ़ी माँगने लगे लेकिन मैंने उनकी एक नहीं सुनी और हम वापस अपने होटल पहुंच गए.
होटल पहुंचते ही रूस के विदेशमंत्री इवानोव का मेरे पास फ़ोन आया कि मुझे बहुत अफ़सोस है कि आपके साथ इस तरह का व्यवहार हुआ. मैंने कहा कि मैं भी बहुत दुखी हूँ और अब तो मैं प्रतिनिधिमंडल स्तर वाली बैठक में भी भाग लेने नहीं आ रहा हूँ.
उन्होंने कहा 'नही नहीं आप आइए. मैं खुद आपको लेने आपके होटल आ रहा हूँ.' फिर वो खुद मुझे लेने आए होटल, तब मैं उनके साथ जाने के लिए तैयार हो गया. जब हम लोग क्रेमलिन पहुंचे तो दोनों प्रतिनिधिमंडलों का एक दूसरे से परिचय करवाया जा रहा था. हम भी लाइन में खड़े हो गए.
वो वॉक आउट मैंने इसलिए किया क्योंकि मैं भी प्रॉटोकॉल का बहुत बड़ा अनुयायी हूँ. मेरा माना है कि भारत दूसरे देशों के प्रतिनिधियों के साथ उसी तरह का व्यवहार करे जैसा दूसरे देशों में भारत के लोगों के साथ होता है. रूस में जब मेरे साथ ये घटना घटी तो मैं बर्दाश्त नहीं कर पाया. '

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