Tuesday, October 8, 2019

पिछले कुछ हफ़्तों के दौरान भूपिंदर सिंह हुड्डा

भूपिंदर हुड्डा के मुख्यमंत्री बनने का जश्न पूरे रोहतक में बड़े धूम-धाम से मनाया गया. सड़कों पर भव्य विजय जुलूस निकाले गए. ख़ास तौर से किलोई विधानसभा क्षेत्र के लोग तो मानो दीवाने ही हो गए थे.
बीजेपी नेता वीरेंदर सिंह चौहान उस वक़्त एक राष्ट्रीय हिंदी अख़बार के पत्रकार थे. चौहान बताते हैं कि जिस दिन हुड्डा ने शपथ ली, उस दिन वो हुड्डा के गढ़ से गुज़र रहे थे. तभी लापरवाही से बाइक चला रहे एक शख़्स ने उनका रास्ता रोक लिया. जब चौहान ने उससे रास्ते से हटने को कहा, तो उसने अपना उप-नाम बताते हुए उन्हें धमकी दी.
चौहान बताते हैं कि उस आदमी ने कहा कि, 'मैं सांघी का हुड्डा हूं. मुझसे मत उलझना वरना तुम्हारी औक़ात बता देंगे.' यानी वो खुल कर राज्य के नए मुख्यमंत्री के साथ अपने ताल्लुक़ की नुमाइश कर रहा था.
मुख्यमंत्री बनने के बाद भूपिंदर हुड्डा ने अपने बेटे दीपेंदर हुड्डा को विदेश से वापस बुलाया. उस समय दीपेंदर अमरीका में नौकरी कर रहे थे. दीपेंदर को रोहतक लोकसभा सीट से टिकट दिया गया. मुख्यमंत्री पिता की सियासी ताक़त की बदौलत दीपेंदर हुड्डा, रिकॉर्ड वोटों से रोहतक सीट से चुनाव जीत गए.
चूंकि भूपिंदर हुड्डा सत्ता के गलियारों में नए-नए दाख़िल हुए थे, तो दो लोकप्रिय जननेता रघुबीर कादियान और आनंद सिंह डांगी हुड्डा के दाहिने और बाएं हाथ बन गए.
मुख्यमंत्री बनने में हुड्डा का साथ देने वाले हरियाणा के चौधरी वीरेंद्र सिंह, कुमारी शैलजा, उद्योपति मरहूम ओपी जिंदल, जैसे दिग्गज कांग्रेसी नेता धीरे-धीरे या तो हाशिए पर चले गए या फिर हुड्डा के विरोध के चलते उन्हें पार्टी छोड़नी पड़ी.
हुड्डा ने पहला काम तो ये किया कि वो ज़मीनी कार्यकर्ताओं से सीधे मिलने-जुलने लगे. इससे पहले इन कार्यकर्ताओं को मुख्यमंत्री तक पहुंचने के लिए विधायकों की मदद लेनी पड़ती थी.
इसकी वजह से भूपिंदर हुड्डा एक लोकप्रिय जननेता के तौर पर स्थापित हो गए, जो पुराने रोहतक से ताल्लुक़ रखते थे. इससे पहले रोहतक के जाट नेता अपनी खड़ी बोली वाली उजड्डता के लिए बदनाम थे.
अब हर रैली में और हर सभा में हुड्डा के नाम के ही नारे लगने लगे थे. नतीजा ये हुआ कि विनोद शर्मा जैसे नेता जो कभी हुड्डा की किचेन कैबिनेट का हिस्सा हुआ करते थे, वो भी पीछे छूट गए.
इसी तरह कभी हुड्डा का साथ देने वाले अहीर नेता कांग्रेस के राव इंदरजीत सिंह और बांगर नेता बीरेंद्र सिंह 2014 के चुनाव से पहले कांग्रेस में अपने साथ भेदभाव का आरोप लगाकर बीजेपी में शामिल हो गए.
भले ही पुराने कांग्रेसी नेता पार्टी छोड़ रहे थे. लेकिन, इधर हुड्डा ने अपने वफ़ादार विधायकों की नई फ़ौज खड़ी कर ली थी और वो ये सुनिश्चित करते थे कि उनके विश्वासपात्र विधायकों को रोहतक इलाक़े से टिकट मिल जाए.
इस दौरान, हुड्डा को ग़ैर-जाट समुदायों से मिलने वाला समर्थन घटने लगा. इसकी दो वजहें थीं. इन ग़ैर-जाट नेताओं को महसूस हुआ कि उनके साथ भेदभाव होता है. फिर, जब हरियाणा के दूसरे हिस्सों के विकास की तुलना पुराने रोहतक से हुई, तो उसमें भी भेदभाव साफ़ नज़र आता था.
आख़िरकार हालात ऐसे बने कि कांग्रेस, रोहतक विधानसभा सीट से भी 2014 में चुनाव हार गई.
हुड्डा के क़रीबी एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता ने बीबीसी को बताया कि भूपिंदर हुड्डा के समर्थन में जुटने वाली भीड़ का रुख़ एक सियासी रणनीति के तहत अब दीपेंदर हुड्डा की तरफ़ मोड़ा जा रहा था. वो बताते हैं कि, ''लोग जब भूपिंदर हुड्डा से विकास के काम कराने की अपील करते थे, तो वो उस पर बहुत ध्यान नहीं देते थे. वहीं, दीपेंदर हुड्डा लोगों की अर्ज़ियों को न सिर्फ़ सुनते थे, बल्कि उनके काम पूरे कराते थे. दीपेंदर बहुत विनम्र और सहज हैं.''
जल्द ही युवा और अनुभवहीन दीपेंदर को कांग्रेस के सीनियर नेता भाई साहब या एमपी साहब कह कर बुलाने लगे थे.
वरिष्ठ पत्रकार और 'हरियाणा के लालो के सबरंग क़िस्से' नाम की किताब के लेखक पवन बंसल कहते हैं कि भूपिंदर हुड्डा से पहले हरियाणा के मुख्यमंत्रियों के काम करने का तजुर्बा बहुत कड़वा रहा था. लेकिन अपनी विनम्रता और सहजता की वजह से दीपू उर्फ़ दीपेंदर, सब के लिए सर्वसुलभ थे.
केंद्र में मोदी के उदय और हरियाणा में क्षेत्रीय भेदभाव का फ़ायदा उठाकर 2014 में बीजेपी ने कांग्रेस को शिकस्त दे दी. लेकिन, पार्टी ने इस जीत का जश्न मनाने के बजाय, ग़ैर-जाटों की नाराज़गी का जज़्बाती फ़ायदा उठाने की अपनी कोशिशें जारी रखीं.
इसकी पहली मिसाल उस वक़्त दिखी, जब बीजेपी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारक और ग़ैर-जाट नेता मनोहर लाल खट्टर को हरियाणा की कमान दी.
इससे ख़ुद से भेदभाव महसूस कर रहे हरियाणा के ग़ैर-जाट लोगों में उम्मीद जगी. इसकी एक वजह ये थी कि मनोहर लाल का दामन बेदाग़ था और उनकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक सीधी पहुंच भी थी.
मज़े की बात ये है कि बीजेपी और मनोहर लाल का सोशल इंजीनियरिंग का ये फॉर्मूला हरियाणा में कभी नाकाम नहीं हुआ. क्योंकि 2014 के बाद से बीजेपी हरियाणा में कोई भी चुनाव नहीं हारी.
पहले तो बीजेपी ने नगर निकाय चुनाव में क्लीन स्वीप किया. इसके बाद 2019 में पार्टी ने हरियाणा की सभी लोकसभा सीटें जीत लीं. भूपिंदर हुड्डा और उनके बेटे दीपेंदर हुड्डा भी अपने-अपने गढ़ यानी रोहतक और सोनीपत से चुनाव हार गए.
बीजेपी पर दबाव था कि वो पारदर्शी और भ्रष्टाचार मुक्त सरकार दे.
'पॉलिटिक्स ऑफ़ चौधर' किताब के लेखक सतीश त्यागी कहते हैं कि क़द्दावर जाट नेता होने के बावजूद अब कांग्रेस आलाकमान उन्हें तरजीह नहीं दे रही थी. हरियाणा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर अशोक तंवर की एंट्री ने हरियाणा कांग्रेस में फूट डाल दी. पार्टी में अंदरूनी लड़ाई तेज़ हो गई.
जब बीजेपी हरियाणा में अपना आधार और वोट बैंक मज़बूत कर रही थी, तब कांग्रेस कई गुटों में बंटी हुई थी. हुड्डा, तंवर, सुरजेवाला और किरन, सब के सब गांधी परिवार के क़रीबी थे.
फरवरी 2016 के नेतृत्व विहीन जाट आरक्षण आंदोलन का केंद्र रोहतक में था. इस आंदोलन के दौरान 30 से ज़्यादा लोग मारे गए थे. जबकि बड़ी संख्या में लोग घायल भी हुए थे. इस वजह से भी हुड्डा के समर्थकों की तादाद कम हुई.
रोहतक के लोग, ख़ास तौर से शहरी इलाक़ों के निवासियों को लगा कि हुड्डा और उनके बेटे उनकी मुसीबत के वक़्त उनके साथ नहीं थे. वो भूपिंदर हुड्डा और उनके सांसद बेटे दीपेंदर को इस बात के लिए माफ़ करने को तैयार नहीं थे. पूरे जाट आंदोलन के दौरान हुड्डा दिल्ली में ही रुके हुए थे.
जाट आंदोलन के लिए लोगों को उकसाने की एक वीडियो क्लिप वायरल होन के बाद हुड्डा के राजनीतिक सलाहकार प्रोफ़ेसर वीरेंदर सिंह के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की गई. इसने भी बीजेपी को हुड्डा को घेरने का मौक़ा दे दिया.
भूपिंदर हुड्डा की पत्नी आशा हुड्डा ने हमें बताया कि रोहतक के हिंसक हालात की ख़बर लगते ही वो रोहतक के लिए रवाना हो गए थे. लेकिन, सरकार ने उन्हें हरियाणा और दिल्ली दिल्ली की सीमा पर ही रोक लिया और राज्य में घुसने ही नहीं दिया. आशा कहती हैं कि हुड्डा परिवार को इस बात का अफ़सोस है कि वो उस मुश्किल वक़्त में रोहतक में नहीं थे. लेकिन, उनका परिवार लाचार था.
हुड्डा से नाराज़ वोटरों ने अपना ग़ुस्सा स्थानीय निकाय चुनावों में कांग्रेस पर निकाला. इसके बाद दीपेंदर हुड्डा 2019 में रोहतक लोकसभा सीट से बीजेपी उम्मीदवार अरविंद शर्मा से चुनाव हार गए.
ब्राह्मण नेता अरविंद शर्मा, हुड्डा के पुराने दोस्त हैं. उन्हें बीजेपी ने दीपेंदर को हराने की नीयत से ही पार्टी में शामिल किया था.
जाट आरक्षण आंदोलन का एक असर ये भी हुआ कि ग़ैर-जाट वोटर बीजेपी के पक्ष में और मज़बूती से लामबंद हो गए. इसका नतीजा ये हुआ कि बीजेपी की जीत का फ़ासला पहले से बहुत ज़्यादा बढ़ गया.

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