Wednesday, October 30, 2019

विश्वनाथ प्रताप सिंह का दिया राज्य मंत्री का पद ठुकराया

आरंभिक झिझक के बाद उन्होंने जनता दल की सदस्यता ग्रहण कर ली. वो चंद्रशेखर के बहुत करीब हो गए. जब विश्वनाथ प्रताप सिंह सत्ता में आए तो उन्होंने उन्हें अपने मंत्रिमंडल में राज्यमंत्री के रूप में जगह दी, लेकिन उन्होंने इस पद को स्वीकार नहीं किया.
यशवंत सिन्हा याद करते हैं, 'जब मैं राष्ट्रपति भवन में घुसा तो मुझे कैबिनेट सचिव टीएन सेशन का लिखा एक पत्र दिया गया. उसमें लिखा था कि राष्ट्रपति ने मेरी राज्य मंत्री के तौर पर नियुक्ति की है. पढ़ते ही मेरा दिल बैठ गया.'
'मैंने 10 सेकेंड के अंदर फ़ैसला किया कि मैं इस पद को स्वीकार नहीं करूँगा. मैं तुरंत पलटा. अपनी पत्नी का हाथ पकड़ा और उससे दृढ़ आवाज़ में कहा, 'तुरंत वापस चलो.'
'पार्टी में मेरी वरिष्ठता को देखते हुए और चुनाव प्रचार में मैंने जिस तरह का काम किया था, वी पी सिंह ने मेरे साथ न्याय नहीं किया था. सबसे बड़ी बात ये थी कि मुझे जूनियर मंत्री का पद दे कर उन्होंने मेरे नेता चंद्रशेखर का भी अपमान किया था.'
इसके बाद जब चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने उन्हें वित्त मंत्री बनाया. लेकिन वो सरकार बहुत अधिक समय तक चली नहीं. सरकार गिरने के कुछ समय बाद उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ले ली जिसमें लाल कृष्ण आडवाणी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
यशवंत सिन्हा बताते हैं, 'चंद्रशेखर की समाजवादी जनता पार्टी समाप्ति की तरफ़ थी. उस समय मेरे पास दो विकल्प थे. एक था कांग्रेस और दूसरी भारतीय जनता पार्टी. नरसिम्हा राव बहुत चाहते थे कि मैं कांग्रेस में आऊँ. उनसे कई बार मुलाकात भी हुई. लेकिन मुझे कांग्रेस पार्टी में जाना अच्छा नहीं लगा.
एक 'कॉमन' मित्र ने मेरी मुलाकात आडवाणी जी से करवाई लेकिन पार्टी में जाने की कोई बात उनसे नहीं हुई. उसी ज़माने में जनता दल के सभी घटकों को एक करने की मुहिम भी चल रही थी.'
यशवंत सिन्हा आगे बताते हैं, ' एक दिन मैं और मेरी पत्नी हवाई जहाज़ से राँची से दिल्ली आ रहे थे. पटना में विमान में लालू प्रसाद यादव सवार हुए. मैंने उन्हें प्रणाम किया लेकिन उन्होंने प्रणाम का जवाब देना तो दूर मुझे पहचानने तक से इंकार कर दिया. दिल्ली में जब जहाज़ उतरा तो मेरे बगल में खड़े रहने के बावजूद उन्होंने मुझसे कोई बात नहीं की. मेरी पत्नी ने मुझसे कहा कि लालू ने आपकी बहुत उपेक्षा की है. लालूजी की इस हरकत को देखते हुए मैंने घर पहुंच कर तुरंत आडवाणीजी को फ़ोन कर कहा कि मैं आपसे तुरंत मिलना चाहता हूँ. कुछ दिनों बाद आडवाणी ने मुझे भारतीय जनता पार्टी में शामिल कर लिया और उन्होंने एक प्रेस कान्फ़्रेंस करके आलान किया कि मेरा बीजेपी में जाना पार्टी के लिए दीवाली गिफ़्ट है.'
1998 में जब भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आई तो आरएसएस ने जसवंत सिंह के मंत्री बनने पर आपत्ति की, क्योंकि वो चुनाव हार गए थे. तब यशवंत सिन्हा को वित्त मंत्री बनाया गया. बाद में वो जसवंत सिंह की जगह भारत के विदेश मंत्री बने.
उसी दौरान उन्हें वाजपेई प्रतिनिधिमंडल के साथ रूस जाने का मौका मिला. यशवंत सिन्हा याद करते हैं, 'हम लोग क्रेमलिन जा रहे थे. वहाँ दो स्तरों पर बातचीत होनी थी. एक तो वाजपेई और पुतिन के बीच आमने सामने की बातचीत होने वाली थी, जिसमें मैं और ब्रजेश मिश्रा दोनों रहने वाले थे.
ब्रजेश मिश्रा वाजपेई जी की गाड़ी में उनके साथ ही बैठ गए क्योंकि रास्ते में उन्हें उनसे बात करनी थी. दूसरी गाड़ी में मैं और रूस में भारत के राजदूत रघुनाथ बैठे. वाजपेई जी की गाड़ी तो सीधे चली गई. हम लोगों को किसी दूसरे गेट पर लाया गया. वहाँ पर उन्होंने हमें कार से उतार कर हमारी सुरक्षा जाँच की. फिर उन्होंने हमें एक जगह ले जा कर बैठा दिया. मैंने कहा कि हमें
यशवंत सिन्हा आगे कहते हैं, 'जब कश्मीर बहुत अशाँत हो गया था 2016 में तो हम कश्मीर गए थे एक समूह के साथ. मैं जब कश्मीर दोबारा गया दिसंबर, 2016 में तो मुझे लगा कि एक रास्ता निकल सकता है. मैंने श्रीनगर से ही प्रधानमंत्री कार्यालय के लिए फ़ोन लगा कर कहा कि मैं उने मिलना चाहता हूँ.'
'उसके बाद मैंने कई बार उनसे मिलने की कोशिश की. लेकिन उन्होंने मुझे कभी समय नहीं दिया. मैं गृह मंत्री से भी मिला. वहाँ से भी मुझे कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिला. जब मेरे अंदर सवाल उठा कि ये लोग कश्मीर में क्यों बातचीत और शाँति का रास्ता नहीं अपनाना चाहते?'
'फिर मैंने दो साल पहले भारत की आर्थिक स्थिति के बारे में इंडियन एक्सप्रेस में एक लेख लिखा था. अगर उस समय मेरी बात को सुना जाता तो भारतीय अर्तव्यवस्था की वो स्थिति नहीं होती जो आज है. लेकिन बात सुनने की बात तो दूर रही, मेरे बारे में कहा गया कि ये 80 साल की उम्र में नौकरी तलाश रहे हैं.'
बातचीत में शामिल होना है, लेकिन इसका उनके ऊपर कोई असर नहीं पड़ा.'
यशवंत सिन्हा आगे बताते हैं, ' मैंने अपने राजदूत रघुनाथ
यशवंत सिन्हा ने 2009 का चुनाव जीता, लेकिन 2014 में उन्हें बीजेपी का टिकट नहीं दिया गया. धीरे धीरे नरेंद्र मोदी से उनकी दूरी बढ़ने लगी और अंतत: 2018 में 21 वर्ष तक बीजेपी में रहने के बाद उन्होंने पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया.
यशवंत सिन्हा बताते हैं, 'हाँलाकि मैंने इस बात की हिमायत की थी कि मोदीजी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाया जाए लेकिन 2014 का चुनाव आते आते मुझे इस बात का आभास हो गया था कि इनके साथ चलना मुश्किल होगा. इसलिए मैंने तय किया कि मैं चुनाव लड़ूंगा ही नहीं.
पार्टी ने मेरी जगह मेरे बेटे को उस सीट का ऑफ़र दिया. वो जीते और मोदीजी ने उन्हें मंत्री भी बनाया. हाँलाकि अब वो मंत्री नहीं हैं 2019 का चुनाव जीतने के बाद भी. इसके बाद भी मैं मोदीजी को सुझाव देता रहा.
अलग अलग मुद्दों पर उन्हें पत्र लिखता रहा. हमारा उनका फ़ासला बढ़ा कश्मीर के मुद्दे को ले कर. मैं चाहता था कि काश्मीर में वाजपेई जी की नीतियों का अनुसरण हो. उनकी नीति थी इंसानियत, जमहूरियत और कश्मीरियत.
'मेरा मानता था कि कश्मीर में सभी संबंधित पक्षों से बातचीत की जाए. वाजपेई जी के समय में हुर्रियत तक से बातचीत हुई थी.'
से कहा कि आप तुरंत गाड़ी मंगवाइए. मैं वापस अपने होटल जाउंगा. हम लोग उस भवन से पैदल ही बाहर निकल लिए. हमने सोचा कि अगर हमारी कार नहीं भी मिली तो हम टैक्सी ले कर अपने होटल चले जाएंगे.
जब हम क्रेमलिन से वॉक आउट कर रहे थे तो दो रूसी पदाधिकारी दौड़ते हुए आए. वो माफ़ी माँगने लगे लेकिन मैंने उनकी एक नहीं सुनी और हम वापस अपने होटल पहुंच गए.
होटल पहुंचते ही रूस के विदेशमंत्री इवानोव का मेरे पास फ़ोन आया कि मुझे बहुत अफ़सोस है कि आपके साथ इस तरह का व्यवहार हुआ. मैंने कहा कि मैं भी बहुत दुखी हूँ और अब तो मैं प्रतिनिधिमंडल स्तर वाली बैठक में भी भाग लेने नहीं आ रहा हूँ.
उन्होंने कहा 'नही नहीं आप आइए. मैं खुद आपको लेने आपके होटल आ रहा हूँ.' फिर वो खुद मुझे लेने आए होटल, तब मैं उनके साथ जाने के लिए तैयार हो गया. जब हम लोग क्रेमलिन पहुंचे तो दोनों प्रतिनिधिमंडलों का एक दूसरे से परिचय करवाया जा रहा था. हम भी लाइन में खड़े हो गए.
वो वॉक आउट मैंने इसलिए किया क्योंकि मैं भी प्रॉटोकॉल का बहुत बड़ा अनुयायी हूँ. मेरा माना है कि भारत दूसरे देशों के प्रतिनिधियों के साथ उसी तरह का व्यवहार करे जैसा दूसरे देशों में भारत के लोगों के साथ होता है. रूस में जब मेरे साथ ये घटना घटी तो मैं बर्दाश्त नहीं कर पाया. '

Tuesday, October 8, 2019

पिछले कुछ हफ़्तों के दौरान भूपिंदर सिंह हुड्डा

भूपिंदर हुड्डा के मुख्यमंत्री बनने का जश्न पूरे रोहतक में बड़े धूम-धाम से मनाया गया. सड़कों पर भव्य विजय जुलूस निकाले गए. ख़ास तौर से किलोई विधानसभा क्षेत्र के लोग तो मानो दीवाने ही हो गए थे.
बीजेपी नेता वीरेंदर सिंह चौहान उस वक़्त एक राष्ट्रीय हिंदी अख़बार के पत्रकार थे. चौहान बताते हैं कि जिस दिन हुड्डा ने शपथ ली, उस दिन वो हुड्डा के गढ़ से गुज़र रहे थे. तभी लापरवाही से बाइक चला रहे एक शख़्स ने उनका रास्ता रोक लिया. जब चौहान ने उससे रास्ते से हटने को कहा, तो उसने अपना उप-नाम बताते हुए उन्हें धमकी दी.
चौहान बताते हैं कि उस आदमी ने कहा कि, 'मैं सांघी का हुड्डा हूं. मुझसे मत उलझना वरना तुम्हारी औक़ात बता देंगे.' यानी वो खुल कर राज्य के नए मुख्यमंत्री के साथ अपने ताल्लुक़ की नुमाइश कर रहा था.
मुख्यमंत्री बनने के बाद भूपिंदर हुड्डा ने अपने बेटे दीपेंदर हुड्डा को विदेश से वापस बुलाया. उस समय दीपेंदर अमरीका में नौकरी कर रहे थे. दीपेंदर को रोहतक लोकसभा सीट से टिकट दिया गया. मुख्यमंत्री पिता की सियासी ताक़त की बदौलत दीपेंदर हुड्डा, रिकॉर्ड वोटों से रोहतक सीट से चुनाव जीत गए.
चूंकि भूपिंदर हुड्डा सत्ता के गलियारों में नए-नए दाख़िल हुए थे, तो दो लोकप्रिय जननेता रघुबीर कादियान और आनंद सिंह डांगी हुड्डा के दाहिने और बाएं हाथ बन गए.
मुख्यमंत्री बनने में हुड्डा का साथ देने वाले हरियाणा के चौधरी वीरेंद्र सिंह, कुमारी शैलजा, उद्योपति मरहूम ओपी जिंदल, जैसे दिग्गज कांग्रेसी नेता धीरे-धीरे या तो हाशिए पर चले गए या फिर हुड्डा के विरोध के चलते उन्हें पार्टी छोड़नी पड़ी.
हुड्डा ने पहला काम तो ये किया कि वो ज़मीनी कार्यकर्ताओं से सीधे मिलने-जुलने लगे. इससे पहले इन कार्यकर्ताओं को मुख्यमंत्री तक पहुंचने के लिए विधायकों की मदद लेनी पड़ती थी.
इसकी वजह से भूपिंदर हुड्डा एक लोकप्रिय जननेता के तौर पर स्थापित हो गए, जो पुराने रोहतक से ताल्लुक़ रखते थे. इससे पहले रोहतक के जाट नेता अपनी खड़ी बोली वाली उजड्डता के लिए बदनाम थे.
अब हर रैली में और हर सभा में हुड्डा के नाम के ही नारे लगने लगे थे. नतीजा ये हुआ कि विनोद शर्मा जैसे नेता जो कभी हुड्डा की किचेन कैबिनेट का हिस्सा हुआ करते थे, वो भी पीछे छूट गए.
इसी तरह कभी हुड्डा का साथ देने वाले अहीर नेता कांग्रेस के राव इंदरजीत सिंह और बांगर नेता बीरेंद्र सिंह 2014 के चुनाव से पहले कांग्रेस में अपने साथ भेदभाव का आरोप लगाकर बीजेपी में शामिल हो गए.
भले ही पुराने कांग्रेसी नेता पार्टी छोड़ रहे थे. लेकिन, इधर हुड्डा ने अपने वफ़ादार विधायकों की नई फ़ौज खड़ी कर ली थी और वो ये सुनिश्चित करते थे कि उनके विश्वासपात्र विधायकों को रोहतक इलाक़े से टिकट मिल जाए.
इस दौरान, हुड्डा को ग़ैर-जाट समुदायों से मिलने वाला समर्थन घटने लगा. इसकी दो वजहें थीं. इन ग़ैर-जाट नेताओं को महसूस हुआ कि उनके साथ भेदभाव होता है. फिर, जब हरियाणा के दूसरे हिस्सों के विकास की तुलना पुराने रोहतक से हुई, तो उसमें भी भेदभाव साफ़ नज़र आता था.
आख़िरकार हालात ऐसे बने कि कांग्रेस, रोहतक विधानसभा सीट से भी 2014 में चुनाव हार गई.
हुड्डा के क़रीबी एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता ने बीबीसी को बताया कि भूपिंदर हुड्डा के समर्थन में जुटने वाली भीड़ का रुख़ एक सियासी रणनीति के तहत अब दीपेंदर हुड्डा की तरफ़ मोड़ा जा रहा था. वो बताते हैं कि, ''लोग जब भूपिंदर हुड्डा से विकास के काम कराने की अपील करते थे, तो वो उस पर बहुत ध्यान नहीं देते थे. वहीं, दीपेंदर हुड्डा लोगों की अर्ज़ियों को न सिर्फ़ सुनते थे, बल्कि उनके काम पूरे कराते थे. दीपेंदर बहुत विनम्र और सहज हैं.''
जल्द ही युवा और अनुभवहीन दीपेंदर को कांग्रेस के सीनियर नेता भाई साहब या एमपी साहब कह कर बुलाने लगे थे.
वरिष्ठ पत्रकार और 'हरियाणा के लालो के सबरंग क़िस्से' नाम की किताब के लेखक पवन बंसल कहते हैं कि भूपिंदर हुड्डा से पहले हरियाणा के मुख्यमंत्रियों के काम करने का तजुर्बा बहुत कड़वा रहा था. लेकिन अपनी विनम्रता और सहजता की वजह से दीपू उर्फ़ दीपेंदर, सब के लिए सर्वसुलभ थे.
केंद्र में मोदी के उदय और हरियाणा में क्षेत्रीय भेदभाव का फ़ायदा उठाकर 2014 में बीजेपी ने कांग्रेस को शिकस्त दे दी. लेकिन, पार्टी ने इस जीत का जश्न मनाने के बजाय, ग़ैर-जाटों की नाराज़गी का जज़्बाती फ़ायदा उठाने की अपनी कोशिशें जारी रखीं.
इसकी पहली मिसाल उस वक़्त दिखी, जब बीजेपी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारक और ग़ैर-जाट नेता मनोहर लाल खट्टर को हरियाणा की कमान दी.
इससे ख़ुद से भेदभाव महसूस कर रहे हरियाणा के ग़ैर-जाट लोगों में उम्मीद जगी. इसकी एक वजह ये थी कि मनोहर लाल का दामन बेदाग़ था और उनकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक सीधी पहुंच भी थी.
मज़े की बात ये है कि बीजेपी और मनोहर लाल का सोशल इंजीनियरिंग का ये फॉर्मूला हरियाणा में कभी नाकाम नहीं हुआ. क्योंकि 2014 के बाद से बीजेपी हरियाणा में कोई भी चुनाव नहीं हारी.
पहले तो बीजेपी ने नगर निकाय चुनाव में क्लीन स्वीप किया. इसके बाद 2019 में पार्टी ने हरियाणा की सभी लोकसभा सीटें जीत लीं. भूपिंदर हुड्डा और उनके बेटे दीपेंदर हुड्डा भी अपने-अपने गढ़ यानी रोहतक और सोनीपत से चुनाव हार गए.
बीजेपी पर दबाव था कि वो पारदर्शी और भ्रष्टाचार मुक्त सरकार दे.
'पॉलिटिक्स ऑफ़ चौधर' किताब के लेखक सतीश त्यागी कहते हैं कि क़द्दावर जाट नेता होने के बावजूद अब कांग्रेस आलाकमान उन्हें तरजीह नहीं दे रही थी. हरियाणा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर अशोक तंवर की एंट्री ने हरियाणा कांग्रेस में फूट डाल दी. पार्टी में अंदरूनी लड़ाई तेज़ हो गई.
जब बीजेपी हरियाणा में अपना आधार और वोट बैंक मज़बूत कर रही थी, तब कांग्रेस कई गुटों में बंटी हुई थी. हुड्डा, तंवर, सुरजेवाला और किरन, सब के सब गांधी परिवार के क़रीबी थे.
फरवरी 2016 के नेतृत्व विहीन जाट आरक्षण आंदोलन का केंद्र रोहतक में था. इस आंदोलन के दौरान 30 से ज़्यादा लोग मारे गए थे. जबकि बड़ी संख्या में लोग घायल भी हुए थे. इस वजह से भी हुड्डा के समर्थकों की तादाद कम हुई.
रोहतक के लोग, ख़ास तौर से शहरी इलाक़ों के निवासियों को लगा कि हुड्डा और उनके बेटे उनकी मुसीबत के वक़्त उनके साथ नहीं थे. वो भूपिंदर हुड्डा और उनके सांसद बेटे दीपेंदर को इस बात के लिए माफ़ करने को तैयार नहीं थे. पूरे जाट आंदोलन के दौरान हुड्डा दिल्ली में ही रुके हुए थे.
जाट आंदोलन के लिए लोगों को उकसाने की एक वीडियो क्लिप वायरल होन के बाद हुड्डा के राजनीतिक सलाहकार प्रोफ़ेसर वीरेंदर सिंह के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की गई. इसने भी बीजेपी को हुड्डा को घेरने का मौक़ा दे दिया.
भूपिंदर हुड्डा की पत्नी आशा हुड्डा ने हमें बताया कि रोहतक के हिंसक हालात की ख़बर लगते ही वो रोहतक के लिए रवाना हो गए थे. लेकिन, सरकार ने उन्हें हरियाणा और दिल्ली दिल्ली की सीमा पर ही रोक लिया और राज्य में घुसने ही नहीं दिया. आशा कहती हैं कि हुड्डा परिवार को इस बात का अफ़सोस है कि वो उस मुश्किल वक़्त में रोहतक में नहीं थे. लेकिन, उनका परिवार लाचार था.
हुड्डा से नाराज़ वोटरों ने अपना ग़ुस्सा स्थानीय निकाय चुनावों में कांग्रेस पर निकाला. इसके बाद दीपेंदर हुड्डा 2019 में रोहतक लोकसभा सीट से बीजेपी उम्मीदवार अरविंद शर्मा से चुनाव हार गए.
ब्राह्मण नेता अरविंद शर्मा, हुड्डा के पुराने दोस्त हैं. उन्हें बीजेपी ने दीपेंदर को हराने की नीयत से ही पार्टी में शामिल किया था.
जाट आरक्षण आंदोलन का एक असर ये भी हुआ कि ग़ैर-जाट वोटर बीजेपी के पक्ष में और मज़बूती से लामबंद हो गए. इसका नतीजा ये हुआ कि बीजेपी की जीत का फ़ासला पहले से बहुत ज़्यादा बढ़ गया.

भूपिंदर सिंह हुड्डा बीजेपी के विजय रथ को चुनौती दे पाएंगे?

हरियाणा के आगामी विधानसभा में मनोहर लाल खट्टर की अगुवाई वाली बीजेपी के विजय रथ को कोई चुनौती दे सकता है, तो वो हैं देसवाली के नेता, 72 बरस के भूपिंदर सिंह हुड्डा.
भूपिंदर सिंह हुड्डा 2005 से 2014 तक हरियाणा के मुख्यमंत्री रहे थे. इस दौरान हुड्डा ने एक तरफ़ तो ख़ुद को राज्य के क़द्दावर जाट नेता के तौर पर स्थापित किया. साथ ही साथ उन्होंने रोहतक और आस-पास के तीन जाट बहुल ज़िलों को अपने गढ़ के तौर पर भी विकसित किया.
रोहतक, झज्जर और सोनीपत के जाटों को हुड्डा के दस साल के शासन काल में ऐसा वीआईपी दर्जा हासिल था कि उन्हें सरकारी नौकरियों में मनमर्ज़ी की पोस्टिंग मिलती थी. हर विकास कार्य में उन्हें तरजीह मिलती थी. इससे राज्य के बाक़ी 19 ज़िलों के लोग पुराने रोहतक के जाटों से जलते भी थे.
इलाक़े के बुज़ुर्ग यानी ताऊ, भूपिंदर सिंह हुड्डा को इस बात का श्रेय देते हैं कि उन्होंने पुराने और अविकसित रोहतक को चंडीगढ़ की तर्ज़ पर एक आधुनिक शहर बनाने की दिशा में बहुत काम किया. हुड्डा की कोशिशों से रोहतक की सड़कें, रोडलाइट और बुनियादी ढांचे में बहुत सुधार आया.
भूपिंदर सिंह हुड्डा के दस साल के शासन काल के दौरान, पुराने रोहतक के मतदाताओं को सरकारी नौकरियों में ख़ूब मौक़े मिले. उन्हें उनकी मन की पोस्टिंग भी मिल जाती थी. और राज्य सरकार के मुख्यालय तक उनकी पहुंच रोहतक के लोगों के लिए ख़ुद भी एक नया तजुर्बा था. और उन्होंने इसका भरपूर उपयोग भी किया.
हालांकि 2005 से पहले हुड्डा की इकलौती शोहरत ये थी कि उन्होंने पूर्व उप-प्रधानमंत्री और बेहद लोकप्रिय क़द्दावर जाट नेता देवीलाल को तीन बार रोहतक लोकसभा सीट से हराया था.
इससे पहले का दौर ऐसा था कि राज्य के मुख्यमंत्री की कुर्सी बागरी के नेताओं की जागीर मालूम होती थी. पहले देवीलाल मुख्यमंत्री बने. फिर उनके बेटे ओम प्रकाश चौटाला ने पद संभाला. इनके अलावा भजन लाल और बंसी लाल मुख्यमंत्री बने तो वो भी बागरी के ही थे. लेकिन, पुराने रोहतक या देसवाली पट्टी के लोगों को कभी भी ये मौक़ा नहीं मिला कि उनके बीच का कोई नेता मुख्यमंत्री बने.
नतीजा ये रहा कि कृषि बहुल हरियाणा के रोहतक पट्टी के लोगों को राज्य के संसाधनों पर भी वाजिब हक़ नहीं मिला.
हालांकि, हरियाणा के अलग राज्य के तौर पर गठन के बाद से ही रोहतक राज्य की राजनीतिक गतिविधियों का गढ़ रहा था. देवीलाल जैसे बड़े नेताओं ने रोहतक को अपनी कर्मभूमि बनाया और सियासी कामयाबी का फल चखा. लेकिन, इसका फ़ायदा रोहतक के वोटरों को नहीं मिला.
सत्ता के गलियारों में पहुंच की रोहतक की जनता की ललक भूपिंदर सिंह हुड्डा ने ही शांत की.
'हरियाणा की पॉवर पॉलिटिक्स' नाम की किताब के लेखक भीम एस दहिया कहते हैं कि हरियाणा की जाट राजनीति में सबसे ज़्यादा ज़ोर इसी बात पर रहा कि राजनीति के अखाड़े में जाटों का प्रभुत्व बना रहे. जाटों के लिए किसी पार्टी की कोई अहमियत नहीं है. बस वो राज्य की सियासत पर हावी रहना चाहते हैं.
जैसे ही उन्हें प्रभुत्व को चुनौती मिलती है या कोई पार्टी उन्हें सियासी हैसियत में पहली पायदान से नीचे रखती है, तो वो उस पार्टी का साथ छोड़ देते हैं. या फिर वो उस पार्टी को ही तोड़ देते हैं. लेकिन, वो कभी भी दोयम दर्जे की हैसियत लंबे समय के लिए मंज़ूर नहीं करते.
भूपिंदर सिंह हुड्डा अपने परिवार में तीसरी पीढ़ी के कांग्रेसी नेता हैं. उन्होंने जाटों के वोट बैंक को एकजुट किया. हुड्डा ने इसके लिए ग़ैर जाट वोटों को एकजुट करने के पूर्व मुख्यमंत्री भजन लाल के सब को ख़ुश करने के फॉर्मूले का इस्तेमाल किया.
वरिष्ठ कांग्रेसी नेता सुभाष बत्रा रोहतक से कांग्रेस के पूर्व विधायक रह चुके हैं. वो 1991 की भजन लाल सरकार में गृह मंत्री भी रहे थे. बत्रा, पुराने दिनों को याद कर के कहते हैं कि 1991 से पहले भूपिंदर सिंह हुड्डा रोहतक की ज़िला अदालत में वकालत किया करते थे.
बत्रा बताते हैं कि उस दौर में हुड्डा अपने बचपन के सभी दोस्तों (जिन में उनके रिश्तेदार चंदर सेन दहिया के अलावा सभी ग़ैर जाट थे) के साथ रोहतक के मॉडल टाउन इलाक़े में ताश खेला करते थे. ये जगह हुड्डा के पुश्तैनी घर के क़रीब ही थी. इस दौरान चाय पर सियासी चर्चाएं भी हुआ करती थीं.
हुड्डा का ये तजुर्बा तब बहुत काम आया, जब उन्होंने चौधरी देवीलाल को चुनाव मैदान में पटखनी दी. शहरी वोटरों की पहली पसंद भूपिंदर सिंह हुड्डा ही थे. जबकि ग्रामीण मतदाता देवीलाल को तरजीह देते थे.
सुभाष बत्रा बताते हैं कि 1991 से पहले भूपिंदर सिंह हुड्डा, किलोई विधानसभा सीट से चुनाव हार गए थे. यहां तक कि उनके बड़े भाई कैप्टन प्रताप सिंह और पिता रनबीर सिंह भी अपने गृह क्षेत्र से चुनाव नहीं जीत सके थे.
किलोई सीट से कांग्रेस के टिकट पर लगातार हारने के बाद सियासी गलियारों में ये चर्चा होती थी कि चूंकि रनबीर सिंह की कांग्रेस मुख्यालय में तगड़ी पैठ है. इसी वजह से बार-बार हारने के बाद भी उनके परिवार को ही टिकट मिल जाता है.
1980 के दशक में रोहतक के लोगों के लिए हुड्डा, उनके 'भूपी' थे, क्योंकि उनका बर्ताव बहुत विनम्रता भरा होता था. वो अपने पिता रनबीर सिंह की गाड़ी चलाया करते थे. रनबीर सिंह संयुक्त पंजाब की सरकार में मंत्री रहे थे. इसके अलावा उनकी पहुंच दिल्ली में सत्ता के गलियारों तक भी थी.
उन दिनों को याद करते हुए सुभाष बत्रा बताते हैं कि, 'रनबीर सिंह ने ही मुझे अपने बेटे भूपी वकील से मिलवाया था. रनबीर सिंह मुझे अपनी फिएट कार में बिठा कर ले गए थे. तब भूपिंदर सिंह हुड्डा ही कार चला रहे थे और उनके पिता पीछे की सीट पर बैठे थे. तब रनबीर सिंह ने मुझे हुड्डा से मिलवाया था.'
बत्रा बताते हैं कि रनबीर सिंह कहा करते थे कि यूं तो उनका बेटा भूपी बहुत सीधा है. लेकिन अगर वो एक बार कुछ ठान लेता है, तो फिर उसे रोकना बहुत मुश्किल होता है.
बत्रा कहते हैं, ''मैं आज भी हुड्डा के मामले में उनके पिता की बातों को सच होते देखता हूं. क्योंकि हुड्डा ने अपने कई ऐसे दोस्तों को बार-बार टिकट दिया, जो चुनाव नहीं जीत पाते थे. भूपी को दोस्तों को धोखा देने के बजाय हार मानना मंज़ूर था. क्योंकि वो यारों के यार हैं और संबंध निभाना जानते हैं.''
ये उस वक़्त की बात है जब भूपी उर्फ़ भूपिंदर सिंह हुड्डा, किलोई सीट से विधानसभा पहुंचने की ज़ोर-आज़माइश कर रहे थे. उस समय हुड्डा की लोकसभा चुनाव में कोई दिलचस्पी नहीं थी. लेकिन, उन्हें लोकसभा का चुनाव लड़ने के लिए उनके चचेरे भाई चौधरी वीरेंद्र सिंह ने राज़ी कर लिया.
चौधरी वीरेंद्र उस वक़्त हरियाणा प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष थे. उनके कहने पर भूपिंदर सिंह हुड्डा, चौधरी देवीलाल के ख़िलाफ़ रोहतक से लोकसभा का चुनाव लड़ने को राज़ी हो गए.
ताक़तवर बागरी नेता चौधरी देवीलाल के ख़िलाफ़ मैदान में उतरने के इस साहसिक फ़ैसले ने भूपिंदर हुड्डा की ज़िंदगी बदल दी. चुनाव प्रचार में हुड्डा ने रोहतक के मेहम में हुए हत्याकांड के मुद्दे को देवीलाल के ख़िलाफ़ ख़ूब भुनाया.
रोहतक के मतदाताओं की देवीलाल को वोट न देने की एक और वजह थी. और वो ये थी कि 1989 में देवीलाल ने रोहतक के अलावा राजस्थान की सीकर सीट से भी चुनाव लड़ा था. दोनों सीटें जीतने के बाद देवीलाल ने हरियाणा की रोहतक सीट के बजाय सीकर को चुना और रोहतक से इस्तीफ़ा दे दिया था.
उस वक़्त रोहतक के ग्रामीण इलाक़े के लोग देवीलाल की पूजा किया करते थे. लेकिन, देवीलाल के इस क़दम से वो छला हुआ महसूस कर रहे थे. उस वक़्त हुड्डा ने शहरी इलाक़ों में अच्छी पहचान बना ली थी. देवीलाल से लोगों की नाराज़गी का हुड्डा ने जमकर सियासी फ़ायदा उठाया.
1991 की ही तरह भूपिंदर हुड्डा ने 1996 और 1998 के लोकसभा चुनावों में भी देवीलाल को शिकस्त दे दी. हालांकि जीत-हार का अंतर बहुत कम था. लेकिन, देवीलाल जैसे क़द्दावर और बेहद लोकप्रिय नेता को लगातार तीन बार हराने की वजह से भूपिंदर सिंह हुड्डा की छवि एक ऐसे नेता की बन गई थी, जो रोहतक के पुराने सपने को पूरा कर सकते थे. और वो सपना था हरियाणा पर हुकूमत करने का.
1999 के लोकसभा चुनाव में हुड्डा को इंडियन नेशनल लोकदल के कैप्टन इंदर सिंह ने हरा दिया था. इंदर सिंह ने इसे मुख्यमंत्री ओपी चौटाला के पिता चौधरी देवीलाल को हराने का बदला क़रार दिया था. कैप्टन इंदर सिंह ने कहा कि केवल 1991 में भूपिंदर हुड्डा की देवीलाल पर जीत असली थी. क्योंकि, हुड्डा ने देवीलाल को 1996 में केवल 2266 वोट और 1998 में केवल 383 वोटों से हराया था.
कैप्टन इंदर सिंह का आरोप था कि हुड्डा को ये जीत धांधली से मिली थी.
इंदर सिंह ने आरोप लगाया कि देवीलाल को हराने के लिए उस वक़्त के मुख्यमंत्रियों, पहले बंसीलाल और फिर भजनलाल ने अपनी ताक़त का इस्तेमाल हुड्डा के पक्ष में किया था.
2004 में जब भूपिंदर सिंह हुड्डा एक बार फिर लोकसभा चुनाव जीते, तो उस वक़्त हरियाणा के मुख्यमंत्री भजनलाल थे. उन्हें ख़्वाब में भी गुमान नहीं था कि भूपिंदर सिंह हुड्डा उनके लिए कोई सियासी ख़तरा बनेंगे और भजनलाल को उनके ही सियासी खेल में मात दे देंगे.
चौधरी देवीलाल को तीन बार लोकसभा चुनाव में हराने के बाद भूपिंदर सिंह हुड्डा में इतना आत्मविश्वास आ गया था कि अब वो हरियाणा की राजनीति में पीएचडी करने का दावा करने वाले भजनलाल को चुनौती देने की स्थिति में पहुंच चुके थे.
अब भूपिंदर हुड्डा ने देसवाली चौधरी के मुख्यमंत्री बनने की वकालत ज़ोर-शोर से करनी शुरू कर दी थी. 'पॉलिटिक्स ऑफ़ चौधर' नाम की किताब लिखने वाले सतीश त्यागी कहते हैं कि भूपिंदर सिंह हुड्डा को 'ड्राइंग रूम पॉलिटिक्स' में महारत हासिल थी. संसद सदस्य होने की वजह से वो दिल्ली के कांग्रेस कल्चर को भी अच्छी तरह से समझ चुके थे.
कांग्रेस के पुराने दिग्गजों की तरह ही भूपिंदर सिंह हुड्डा भी देर रात तक जागते थे और लोगों से मिलते रहते थे. इस तरह उन्होंने गांधी परिवार के क़रीबी नेताओं का दिल जीत लिया था. रोहतक के लोगों से हुड्डा ये कहा करते थे कि वो बरास्ते दिल्ली, चंडीगढ़ पहुंचेंगे, यानी मुख्यमंत्री बनेंगे.
उस वक़्त प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के मददगार बनकर भजनलाल, सोनिया गांधी की नाराज़गी मोल ले चुके थे. वहीं, भूपिंदर सिंह हुड्डा ने अहमद पटेल और मोतीलाल वोरा जैसे नेताओ की मदद से सोनिया गांधी की कृपा हासिल कर ली थी.
जब 2005 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 67 सीटें जीतकर बहुमत से सत्ता में आई, तो ज़्यादातर विधायकों ने भजनलाल को मुख्यमंत्री बनाने का समर्थन किया. सोनिया गांधी ने पर्यवेक्षकों की एक टीम दिल्ली से चंडीगढ़ भेजी. इन पर्यवेक्षकों ने विधायकों से बात करके उनसे इस बात पर सहमति ले ली कि इस बार मुख्यमंत्री आलाकमान तय करेगा.
त्यागी बताते हैं कि तब सोनिया गांधी के विश्वासपात्र जनार्दन द्विवेदी को ये बात अच्छे से पता थी कि ज़्यादातर विधायक भजनलाल को मुख्यमंत्री बनाने के हक़ में हैं. लेकिन, उन्होंने हर विधायक से मुख्यमंत्री पद के लिए उसकी पसंद को निजी तौर पर काग़ज़ पर लिखवा लिया. और आख़िर में कहा कि सीएम कौन बनेगा, विधायक ये फ़ैसला सोनिया गांधी पर छोड़ दें.
वो 4 मार्च की सर्द सुबह थी. भजनलाल अपने समर्थक विधायकों के साथ दिल्ली में अपने आवास पर डटे हुए थे और इस बात का इंतज़ार कर रहे थे कि सोनिया गांधी, सीएम पद के लिए उनके नाम का ऐलान करें. लेकिन, शाम 4 बजते-बजते उनका सपना चकनाचूर हो चुका था. उस दिन शाम को हरियाणा के नए सीएम के तौर पर भूपिंदर सिंह हुड्डा के नाम का ऐलान हुआ.
अब हुड्डा को सीएम स्वीकार करने के अलावा विधायकों के पास कोई चारा नहीं था. जब उनके सामने ये साफ़ हो गया कि हुड्डा ही सोनि

Friday, September 13, 2019

كيف سيغير "الشعور بالذنب" مستقبل السفر جوا؟

صعدت الشهر الماضي إلى الطائرة لأول مرة بعد أن امتنعت خمس سنوات عن ركوبها. وكان آخر عهدي بها في عام 2014 حين كنت أعيش في فرنسا وأردت أن أحضر زفاف أختي في اسكتلندا.
وكان السبب الرئيسي الذي حملني على تفادي السفر جوا هو حجم انبعاثات الكربون الناتجة عن الطائرات، وكنت أشعر بوخز الضمير منذ أن كنت في مرحلة المراهقة كلما سافرت بالطائرة، بعد أن تعمقت في القراءة عن تغير المناخ وآثاره.
واكتشفت أنه لا يوجد أي نشاط يمارسه البشر يطلق هذه الكميات الهائلة من ثاني أكسيد الكربون في الغلاف الجوي أسرع من السفر جوا. ولهذا قررت ألا أستقل طائرة إلا في حالات الضرورة القصوى.
وفي العام الماضي، ظهرت حركة جديدة في السويد عرفت باسم "الشعور بالذنب بسبب السفر جوا"، ولاقت صدى كبيرا في أوروبا. ويشير اسم الحركة إلى الشعور الذي يعتري المرء من ركوب الطائرة في وقت أصبح فيه العالم في أمس الحاجة إلى تخفيض انبعاثات الغازات المسببة للاحتباس الحراري. وهذا يشير إلى التناقض بين السعادة الغامرة للسفر بالطائرات في عطلة نهاية الأسبوع وبين الواقع المؤلم لتداعيات تغير المناخ على العالم.
وقد أدى رفض النقل الجوي إلى زيادة الإقبال على السفر بالقطارات، وتحدث البعض عن متعة السفر بالقطارات ليلا، كما واجه الساسة ضغوطا متزايدة للبحث عن حلول لتأثير الطائرات على المناخ.
لا تهدف هذه الحركة إلى إحراج الآخرين الذين يسافرون بالطائرات، ولا إلى إثناء الناس عن السفر واستكشاف العالم، بل تهدف إلى تغيير أنماط السفر. وتقول آنّا هيوز، التي تدير حملة "الامتناع عن السفر جوا في عام 2020" في المملكة المتحدة، إن هناك الكثير من الأماكن التي يمكننا زيارتها بوسائل نقل أخرى.
وتقول هيوز إن هذه الحركة تروج لرحلات السفر الأكثر بطئا وأقل إضرارا بالبيئة من رحلات الطيران، مثل السفر بالقطارات التي تطلق عُشر الانبعاثات التي تطلقها الطائرات عند قطع نفس المسافة. كما أنها أكثر متعة من رحلات الطيران بمراحل.
ولم تعد الطائرات الخيار الأسرع والأرخص للسفر، بعد أن تطورت القطارات عالية السرعة. وأشارت إحصاءات إلى أن خطوط السكك الحديدية للقطارات عالية السرعة قد تودي إلى تقليل حركة النقل الجوي في نفس المسارات بما يصل إلى 80 في المئة.
وقد استمتعت طيلة السنوات الخمس التي امتنعت فيها عن ركوب الطائرات بالسفر البطئ عبر القطار، وتجاذبت أطراف الحديث مع راكبين إيرانيين في آخر الليل في القطار المتجه إلى مدينة فيرونا الإيطالية، واحتسيت الخمر في طاولة المشروبات بقطار النوم المتجه إلى إدنبرة.
ويقول روجر تايرز، عالم اجتماع عاد مؤخرا من الصين دون أن يستقل طائرة في رحلة استغرقت أسبوعين بالقطار في الذهاب وفي العودة: "كانت رحلة رائعة، استمتعت بأشياء كثيرة لا يتسنى لك أن تفعلها في الطائرة"، مشيرا إلى أنه لم يعان من الإرهاق الناتج عن الرحلات الجوية الطويلة.
ولتوضيح الفارق بين تأثير القطار والطائرة على المناخ، فإن الرحلة بالطائرة عودة فقط من لندن إلى موسكو تستهلك خمس نصيب الفرد من انبعاثات الكربون في السنة. ويعرف نصيب الفرد من انبعاثات الكربون بأنه الحد الأقصى من انبعاثات الكربون الذي يمكن لشخص واحد إطلاقه حتى عام 2030، فإذا تجاوز هذا الحد سيسهم في الاحتباس الحراري. في حين أن نفس الرحلة بالقطار قد تستهلك نحو واحد على خمسين من نصيب الفرد من انبعاثات الكربون في السنة.
وقد يتضاعف تأثير انبعاثات الطائرات على البيئة إذا أخذنا في الحسبان تأثير الغازات الدفيئة الأخرى غير ثاني أكسيد الكربون، مثل البخار في الدخان المتولد من الطائرات الذي يسمى "خطوط التكثف"، وثاني أكسيد النيتروجين الذي تطلقه الطائرات عندما تحلق على ارتفاعات شاهقة. ويصل هذا الأثر إلى ثلاثة أضعاف إذا كنت في درجة رجال الأعمال، بسبب رحابة المقاعد والاستخدام غير الفعال للمساحات في الطائرة.
ظهرت حركة "الشعور بالذنب من السفر جوا" في عام 2017، عندما أعلن المغني السويدي ستافان ليندبرغ عن اعتزامه التوقف عن ركوب الطائرات، وانضم إلى صفه الكثير من المشاهير، منهم مغنية الأوبرا مالينا إيرنمان، أم غريتا ثانبرغ، الناشطة في مجال المناخ التي لم تتجاوز 16 عاما.
ولاقت الفكرة تأييدا كبيرا في السويد، وحقق هاشتاغ "ابق على الأرض" انتشارا واسعا، واجتذب حساب على انستغرام لنفس الغرض 60 ألف متابع. وقد ساهمت تغريدات ثانبرغ، التي تدعو لتفادي السفر بالطائرات، في استقطاب المزيد من المؤيدين للحركة.
وقد أثرت الحركة على أنماط السفر في السويد، إذ أعلنت شركة "سويدافيا" المشغلة لعشر مطارات في السويد أن أعداد المسافرين تراجعت في مطاراتها في الشهور الثلاث الأولى من عام 2019، وتعزو الشركة ذلك التراجع إلى الجدل الدائر حول الطقس.
وأشار استطلاع للرأي أجراه الصندوق العالمي للطبيعة، إلى أن 23 في المئة من السويديين خفضوا تنقلاتهم الجوية في عام 2018 بسبب تأثيرها على البيئة.
وتفرعت من هذه الحركة حركات أخرى في بلدان عدة، مثل حملة "الامتناع عن السفر جوا في عام 2020"، وحركات مشابهة في كندا وبلجيكا وفرنسا. وفي كل مبادرة، لا يلتزم الموقعون بالتوقف عن السفر جوا ما لم يصل عدد الموقعين على العريضة إلى 100 ألف شخص في البلد الواحد.
وشرعت بعض المؤسسات في تأييد الحركة، مثل جريدة "بوليتيكين" الدنماركية، التي وضعت خططا لوقف حجز تذاكر طيران محلية لصحفييها، والتركيز على الأماكن التي يمكن الوصول إليها بالقطار.
واشتهر الكثير من علماء المناخ البارزين بسبب جهودهم لتخفيض السفر جوا، سواء للعمل أو للأغراض الشخصية. وانضم 650 أكاديميا إلى حملة للحد من السفر جوا. وترى لاركين التي لم تسافر بالطائرة منذ أكثر من عقد، أن المؤسسات يجب أن تغير توقعاتها وسياساتها حيال سفر موظفيها وأعضائها.
وترى أن الأساتذة والباحثين في مجال تغير المناخ يجب أن يكونوا قدوة للآخرين بالامتناع عن السفر جوا، حتى لا يكونوا كالطبيب الذي يدخن وينصح المريض بالامتناع عن التدخين.
لكن هل يمكن لمجموعة أفراد قرروا التوقف عن السفر جوا أن يؤثروا على حركة الطيران التي من المتوقع أن تشهد زيادة كبيرة في العقدين القادمين؟
يقول تايرز: "أنا لا أتوقع أن يتوقف الجميع عن السفر جوا كما فعلت، لكن ربما تسهم رحلتي الشاقة إلى موسكو برا في تنبيه الناس إلى آثار انبعاثات الطائرات على البيئة. وأتمنى أن يبحث البعض عن طرق بديلة للسفر بالطائرات".
وفي بحث أجراه ستيف ويستليك من جامعة كارديف، ذكر المشاركون أن التزام البعض بالامتناع عن السفر جوا حملهم على تخفيض تنقلاتهم الجوية.
لا شك أنه ليس من السهل الامتناع كليا عن السفر جوا، لكن تقليل الرحلات الجوية قدر الإمكان يسهم في تخفيض نصيب الفرد من الانبعاثات المسببة للاحتباس الحراري.
ويرى ويستليك أن الهدف هو وضع نظام جديد للضرائب بحيث تحتسب الضريبة على الطائرات بناء على حجم تأثيرها على البيئة، أو تفرض ضريبة على الركاب بحسب عدد المرات التي يسافرون فيها جوا. وقد فرضت الحكومة السويدية ضريبة بيئية على الطائرات وتعتزم الاستثمار في القطارات الليلية.
لكن ويستليك ينكر محاولات التأثير على الأخرين لدفعهم إلى الامتناع عن ركوب الطائرات، من خلال استخدام شعارات من قبيل "الخجل من ركوب الطائرات" أو "تأنيب الضمير" أو "الالتزام الأخلاقي للسفر برا".
لكن هيوز تقول إن هذه الحملات ينبغي أن تكون مؤثرة، وترى أن الخجل من ركوب الطائرات قد يكون له أثر إيجابي، فعندما يشعر الناس أن ركوب الطائرات أمرا مستجهنا سيتوقفون عن السفر جوا.
وقد يكون الحل في شعار أخير انتشر في السويد، وهو "التباهي بالقطارات"، الذي يحفز الناس على الامتناع عن السفر جوا بطريقة إيجابية.

Monday, August 19, 2019

"محشومة يا أم الرجال": هل تمادت أطراف الأزمة القطرية في خصومتها؟

ولا يتعلق هذا التلاسن بفعل أو تصريح أو بروز إعلامي للشيخة القطرية التي كان آخر ظهور لها عبر وسائل التواصل الاجتماعي يوم الحادي عشر من الشهر الجاري حيث نشرت صورة لها مع زوجها أمير قطر السابق حمد بن خليفة آل ثاني وتمنت عيداً مباركاً لجميع المسلمين.
وعلى ما يبدو بدأت موجة التلاسن بين أنصار قطر من جهة ومؤيدي الدول الأربع المقاطعة لها من جهة أخرى مع بروز تغريدة لأحد الأشخاص التابعين للفريق الثاني، اُعتبرت مسيئةً بحق الشيخة موزة.
وتعكس وسائل التواصل الاجتماعي عندما يتعلق الأمر بالأزمة القطرية حالة الشقاق والانقسام التي اعترت المجتمعات الخليجية بفعل الأزمة التي جاوز عمرها العامين حتى الآن دون أي بوادر لحلٍ ينهيها رغم جهود الوساطة الكويتية.
ولا يعد تلاسن هذه المرة فريداً من نوعه. كما لا تكاد وسائل التواصل الاجتماعي تخلو كل يوم من معارك كلامية على خلفية الأزمة القطرية. ولكن لوحظ اليوم دعوة الكثيرين للتعقل وضرورة التزام مكارم الأخلاق وعدم تجاوز ما اعتبروها خطوطاً حمراء تطال "العرض" و"الشرف". ولم تقتصر هذه الدعوة على أي طرف وشملت مستخدمين من السعودية التي تتزعم حملة المقاطعة ضد قطر.
من هؤلاء أبو حسن الذي كتب يقول: "حفظ الله الاعراض فجعل شهادة الزنا أصعب الشهادات في ديننا بل وجعل العقوبة على الشهود اذا اختلفت كلمة في شهاداتهم صونا للاعراض حتى ممن رأى بأم عينه فما بالنا بمن عرفن بالشرف والعفة واليد البيضاء، لعنة الله على كل أفاك جاء في عرض مؤمنة وكل ولي أمر تسامح في ذلك #محشومة_يا_أم_الرجال".
أما مستخدم تويتر أبو عمرة محمد فكتب يقول: "#محشومة_يا_أم_الرجال بغض النظر عن أوصافها وما تقوم به تجاه العروبة والبشرية،وعلى فرض انها ليست شيخة وأم حاكم قطر المفدى و زوجة أمير قطر أطال الله في عمره وبغض النظر عن مكانتها بين نساء العالمين هل تقبل أو تسمح أخلاق العروبة والرجولة التطاول على إمرأةبهذا الشكل المستمر والممنهج؟".
وكتبت المستخدمة فوزية علي: "الشيخة موزا أم الرجال وأخت الرجال وابنة الرجال، صاحبة المبادرات الانسانية والعلمية مثل علّم طفلا لتعليم 10 ملايين طفل فقير في العالم، ومؤسسة صلتك لتشغيل الالاف من الشباب العربي ، لن يضيرها نبح الكلاب التي لا شرف لها ولا رجولة ، فدع الكلاب تنبح والقافلة تسير #محشومة_يا_أم_الرجال".
في المقابل، عبر البعض عن استيائه من الفريق الذي رفض تأييد التغريدة المثيرة للجدل فيما نأى البعض الآخر بنفسه عما حدث وانتهز الفرصة لتأكيد موقفه من الأزمة القطرية والطرف الذي يصطف بجانبه. مثال ذلك المستخدم محمد الكواري الذي كتب يقول: "مايدفعه النظام القطري اليوم لمواجهة أزمة المقاطعة هي نفس الأموال الفائضة التي كان يمول بها الارهاب .. لذلك لن ترى بعد اليوم أي منظمة ارهابية تنتعش .. لأن "الممول" مشغول في مواجهة ازمته".
يُشار الى أن النبذة التعريفية بالشيخة موزة على موسوعة ويكيبيدا تستشهد بمقالٍ لنيويورك تايمز يتهم وسائل إعلام في السعودية والإمارات ومصر بتوجيه إهانات بالغة لها حيث تصورها بالمرأة المتعطشة للسلطة التي تتلاعب بالرجال الضعفاء.
استمر هاشتاغ #فرح_السودان بتصدر قائمة أكثر الهاشتاغات تداولا صباح اليوم الاحد 18 أغسطس/ آب في عدد من الدول العربية بعد أن تم التوقيع يوم أمس السبت على اتفاق لتقاسم السلطة في السودان بين المجلس العسكري الحاكم والمعارضة المدنية.
ويمهد الاتفاق التاريخي الطريق للانتقال الى الحكم مدني. وتم التوصل إليه بعد شهور من الاحتجاجات المطالبة بالديمقراطية والتي اطاحت بحكم الرئيس عمر البشير الذي استمر 30 عاما.
وحصد هاشتاغ #فرح_السودان أكثر من 40 ألف تغريدة خلال الساعات الأربع والعشرين الماضية. كما انتشر هاشتاغ باسم السودان ليحصل على أكثر من 30 ألف تغريدة خلال الساعات الماضية.
وأعرب عدد كبير من المغردين السودانيين عبر موقع تويتر عن فرحهم بهذا الإنجاز وتحدثوا عن أملهم بأن تهدأ الأوضاع وتخرج البلاد من الفوضى ويعم السلام.

Friday, July 26, 2019

ما التحديات التي تقف أمام اتفاق تقاسم السلطة في السودان؟

مشاعر مختلطة يعيشها السودانيون بعد توقيع المجلس العسكري الانتقالي الحاكم وقوى الحرية والتغيير بالأحرف الأولى على اتفاق تقاسم سلطة، في محاولة لتعبيد الطريق أمام سودان جديد تحت مظلة نظام ديمقراطي يحترم حقوق وحريات الفرد، طالما حلم به أهله.
ووقع ممثلون عن المجلس العسكري الانتقالي وقوى الحرية والتغيير اتفاقا، الأربعاء 17 يوليو/تموز، بحضور وسيطين إفريقيين. وينص الاتفاق على تشكيل مجلس سيادي مكون من 11 عضوا، بينهم خمسة عسكريين يختارهم المجلس العسكري وخمسة مدنيين يختارهم تحالف قوى إعلان الحرية والتغيير، بالإضافة إلى عضو مدني آخر يتفق عليه الجانبان.
واتفق الطرفان على فترة انتقالية تسمر لنحو ثلاث سنوات، يتولى العسكريون رئاسة المجلس في أول 21 شهرا منها، بينما يتولى المدنيون رئاسته خلال المدة المتبقية، وهي 18 شهرا. وستحدد الوثيقة الدستورية واجبات ومسؤوليات المجلس السيادي.
كما ينص الاتفاق على تشكيل حكومة انتقالية تختار قوى الحرية والتغيير رئيسها، الذي يقوم بدوره باختيار عدد من الوزراء لا يتجاوز عشرين وزيرا ، باستثناء وزيري الدفاع والداخلية، اللذين يرجع للعسكريين في المجلس السيادي الحق في اختيارهما.
كما توافق الطرفان على تشكل "لجنة تحقيق وطنية مستقلة" في أحداث عنف الثالث من يونيو/حزيران 2019، في إشارة إلى فض اعتصام القيادة العامة، الذي راح ضحيته عشرات القتلى والمصابين.
وبالرغم من الإيجابيات التي تبدو في الاتفاق، إلا أن مخاوف تنتاب البعض خاصة فيما يتعلق بملفات شائكة تتباين فيها وجهات النظر بين أطراف متشابكة في المشهد السياسي السوداني.
فعلى خلاف اتفاق الطرفين على مبدأ تشكيل مجلس تشريعي، لم يتوافقا على كيفية تكوينه، لذلك أرجأ المتفاوضون المناقشات بشأن تشكيله إلى ما بعد تكوين مجلسي السيادة والوزراء، على أن يتم ذلك في فترة لا تتجاوز ثلاثة أشهر من تكوين مجلس السيادة.
كما أن هناك ملفا شائكا آخر هو ملف إحلال السلام في مناطق دارفور ومنطقتي النيل الأزرق وجنوب كردفان. إذ تُولى الحركات المسلحة أهمية قصوى لهذا الملف وتطلب السرعة في التعامل معه.
وبالرغم من انخراط الجبهة الثورية، ائتلاف يضم عددا من الحركات المسلحة، ضمن ائتلاف قوى الحرية والتغيير، إلا أن أطرافا من الجبهة الثورية ترى أنه تم تهميشها، وهددت باللجوء إلى التفاوض المباشر مع المجلس العسكري. وفي محاولة لرأب الصدع بين قوى الحرية والتغيير والحركة الثورية، تجرى لقاءات بين ممثلي الطرفين للوصول إلى تسويات ترضي الطرفين.
كما رفض الحزب الشيوعي السوداني اتفاقم تقاسم السلطة الذي وقعه حلفاؤه في قوى الحرية والتغيير. وأضاف الحزب الشيوعي في بيان له أن الاتفاق "منقوص ومعيب" ويصب في مجرى الهبوط الناعم الذي يعيد إنتاج الأزمة.
ويرى البعض أن اختلاف مشارب وأولويات القوى المختلفة التي تنضوي تحت مظلة قوى الحرية والتغيير قد تؤدي إلى نشوب خلافات داخل الائتلاف تنتهي بتصدعه وإضعافه.
ولا يغيب عن المشهد مستقبل الإسلاميين في السودان الجديد، إذ يتخوف إسلاميون عارضوا نظام البشير أن يتم استبعادهم تماما من المشهد السياسي. ويضيف هؤلاء أنهم جزء من المشهد السياسي، ولهم حضور وحاضنة شعبية ولا يمكن الوصول إلى حلول حقيقية لمشاكل السودان دون تواجدهم في المشهد العام.
ويتخوف سودانيون من دور دول إقليمية يرون أنها قد تعمل على إفساد تنفيذ الاتفاقات الموقعة تحقيقا لمصالحها الخاصة. وكانت كل من السعودية والإمارات قد تعهدتا بتقديم مساعدات تقدر بنحو ثلاثة مليارات دولار. كذلك يتوجس البعض من الدور المصري، الذي يتهمونه بمحاولة إضفاء شرعية على سلطة المجلس العسكري، من خلال دعم سياسي في الاتحاد الإفريقي.
وتولى المجلس العسكري حكم السودان بعد الإطاحة بالرئيس السوداني السابق، عمر البشير، في 11 نيسان/أبريل، عقب مظاهرات حاشدة منددة بحكمه وداعية إلى تنحيته. وبدأ المحتجون اعتصاما أمام مقر قيادة الجيش في الخرطوم في 6 ابريل/نيسان، وهو الاعتصام الذي أدى إلى الإطاحة بالرئيس السابق.
وقالت مصادر طبية إن 130 شخصا، على الأقل، قتلوا منذ بدء الاحتجاجات في السودان، أغلبهم أثناء فض اعتصام القيادة المركزية للقوات المسلحة في الخرطوم. وقالت وزارة الصحة السودانية إن 60 شخصا قتلوا أثناء فض هذا الاعتصام أوائل الشهر الماضي.
  • وهل ستلعب الدول الإقليمية دورا ايجابيا للمساعدة في تنفيذ الاتفاق أم ستحاول عرقلته حفظا لمصالحها؟
انتظرونا في حلقة خاصة من نقطة حوار، تأتيكم مباشرة الجمعة 26 من يوليو/تموز، بحضور ممثلين عن قوى سودانية فاعلة، فضلا عن حضورمن السودانيين والسودانيات المتواجدين في المملكة المتحدة. تابعونا على الهواء مباشرة على شاشة وأثير بي بي سي عربي في تمام 16:06 توقيت غرينيتش.

Wednesday, July 3, 2019

आरिफ़ मोहम्मद ख़ान को कांग्रेस पर इतना ग़ुस्सा क्यों आता है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लगता है कि कांग्रेस ने मुसलमानों को छला है.
राजीव गांधी की सरकार में मंत्री रहे आरिफ़ मोहम्मद ख़ान को भी लगता है कि 1986 में राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री रहते हुए अयोध्या और शाहबानो मामले में जो रुख़ अपनाया उसकी प्रतिक्रिया में देश सांप्रदायिकता की आग में झुलसा.
आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने शाहबानो मामले में मंत्रिमंडल और कांग्रेस से इस्तीफ़ा दे दिया था. शाहबानो इंदौर की एक मुस्लिम महिला थीं, सुप्रीम कोर्ट ने तलाक़ के मामले में उनके पति को हर्जाना देने का आदेश दिया था लेकिन राजीव गांधी ने संसद के ज़रिए इस फ़ैसले को पलट दिया था. राजीव गांधी पर आरोप लगा कि शाहबानो मामले में उन्होंने मुस्लिम कट्टरपंथियों के सामने घुटने टेक दिए थे.
आरिफ़ का कहना है कि जब उन्होंने इस्तीफ़ा दिया तो कांग्रेस के बड़े नेताओं ने इस्तीफ़ा वापस लेने के लिए मनाने की कोशिश की थी और इसी सिलसिले में तब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पीवी नरसिम्हा राव भी उन तक पहुंचे थे.
आरिफ़ ने दावा किया है कि पीवी नरसिम्हा राव ने उनसे कहा था, "तुम इस्तीफ़ा क्यों दे रहे हो? तुम्हारा अभी लंबा करियर है. इस मामले में तो अब शाहबानो भी मान गई है. हम कोई समाज सुधारक नहीं हैं. अगर मुसलमान गटर में रहना चाहते हैं तो रहने दो."
प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले हफ़्ते संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण के बाद धन्यवाद प्रस्ताव पर आरिफ़ के इसी दावे का उल्लेख किया था. संसद में मोदी ने कहा था कि कांग्रेस मुसलमानों की किस क़दर हितैषी रही है इसी से अंदाज़ा लगा लीजिए. इसके बाद से आरिफ़ मोहम्मद ख़ान चर्चा में हैं.
आरिफ़ कहते हैं कि "पीवी नरसिम्हा राव जब ज़िंदा थे तभी मैंने उनकी ये बात कही थी" लेकिन इस पर राव ने कोई प्रतिक्रिया दी है इसकी उन्हें कोई जानकारी नहीं है. पीएम मोदी ने संसद में न तो नरसिम्हा राव का नाम लिया था और न ही आरिफ़ मोहम्मद का, लेकिन बाद में चीज़ें सामने आईं.
दिलचस्प यह है कि पीवी नरसिम्हा राव ने मुसलमानों के बारे में गटर वाली बात कही थी लेकिन संसद में मोदी ने ये बात भी कही कि कांग्रेस ने पीवी नरसिम्हा राव को भारत रत्न नहीं दिया.
मोदी एक तरफ़ राव की टिप्पणी को कांग्रेस की मुसलमानों के प्रति सोच के रूप में पेश कर रहे हैं तो दूसरी तरफ़ उन्हें भारत रत्न भी देने की मांग कर रहे हैं. क्या यह अपने आप में विरोधाभास नहीं है?
इस सवाल पर आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने बीबीसी को दिए इंटरव्यू में कहा कि यह जाकर मोदी जी से ही पूछिए और वो इस बारे में कुछ नहीं कहना चाहते हैं. आरिफ़ कहते हैं कि उन्हें भारत रत्न की मांग पर कोई हैरानी नहीं है.
वो कहते हैं, "इससे मैं बिल्कुल हैरान नहीं हूं. मोदी ये बता रहे हैं कि कांग्रेस में काम करने का तरीक़ा क्या है. अगर आप निष्पक्ष होकर देखेंगे तो यह इल्ज़ाम तो कांग्रेस वालों ने भी अपनी पार्टी के ऊपर लगाए हैं. सदस्यों ने ये आरोप लगाए हैं कि पार्टी नरसिम्हा राव जी को याद तक नहीं करती है. यह इल्ज़ाम तो ख़ुद कांग्रेसी लगा चुके हैं, मोदी जी तो बहुत बाद में लगा रहे."
लेकिन बीजेपी और मोदी को नरसिम्हा राव पर प्यार क्यों आ रहा है? आरिफ़ कहते हैं, ''ये सवाल मेरे लिए नहीं है. आपको मैं बता दूं कि मैं पिछले 12-13 साल से चुनावी राजनीति से अलग हूं. मैं टिप्पणीकार नहीं हूं, यह मेरा काम नहीं है."
आरिफ़ मोहम्मद ख़ान मानते हैं कि देश में सांप्रदायिक राजनीति को बढ़ावा 1986 में राजीव गांधी की नीतियों से मिला है.
आरिफ़ मानते हैं कि 1986 में राजीव गांधी ने शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को निष्प्रभावी बनाने और राम मंदिर के ताला खुलवाने का जो फ़ैसला लिया उसकी प्रतिक्रिया में सारी चीज़ें हुईं.
इसके साथ ही आरिफ़ ये भी मानते हैं कि राजीव गांधी को लोगों ने ऐसा करने पर मजबूर किया क्योंकि वो राजनीति में नए थे. लेकिन सच तो ये है कि भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में राजीव गांधी को लोकसभा चुनाव में जितनी सीटें मिलीं उतनी आज तक किसी को नहीं मिलीं. ऐसे में एक मज़बूत सरकार मजबूर सरकार कैसे बन गई?
आरिफ़ ख़ान कहते हैं, "मैं ये नहीं कह रहा हूं कि वो मजबूर थे. मेरा कहना ये है कि उस वक़्त जो मजबूरी और लाचारी दिखाई गई, उसी ने देश के अंदर इतनी प्रतिक्रिया पैदा की. आपको 400 से ज़्यादा सीटें मिली थीं और आपने एक कमज़ोर समूह के सामने, उनकी हिंसात्मक भाषा के आगे, उनकी धमकियों के आगे घुटने टेक दिए."
"देश के हर नागरिक ने आपमानित महसूस किया. यही वजह है कि 1986 के बाद कांग्रेस को संसद में 200 सीटें भी नहीं मिल पाईं. उत्तर प्रदेश विधानसभा में कभी 100 सीटें नहीं मिल पाईं.''

Wednesday, June 19, 2019

进口牛肉填饱中国胃口?

2019年2月的春节假期结束后不久,北京新发地农产品批发市场牛羊肉大厅里又热闹起来。新发地被称为北京市的“菜篮子”,因为食材新鲜又便宜,很多市民会驱车到此采购。45岁的牛羊肉店主李成从事牛羊肉销售十多年,他说,“12月之后,牛肉价格几乎天天涨。”

近年来,中国牛肉消费需求的增长让国内肉牛养殖产业有些跟不上了。在水涨船高的牛肉价格和巨大的供需缺口推动下,牛肉市场成了进口贸易商眼中的一块“肥肉”。逐年增加的进口牛肉背后有市场因素的推动,也是中国民众食物消费观念与结构转变的缩影

进口牛肉来了

农业农村部监测显示,2018年夏天开始,中国市场牛肉价格持续上涨,即使2019年春节后有所下降,截至三月初,牛肉批发价格相比于2018年初已经累积上涨超过11%。

一家新西兰进出口贸易公司 的CEO郝娜告诉中外对话,这轮牛肉价格浮动和非洲猪瘟造成的猪肉供应量减少、鸡肉价格飙升存在一定关联,但是更长久的原因在于国内牛肉供需的不平衡。

2000年之后,中国家庭收入增长促进了肉类食品消费量,2017年中国牛肉消费量已达到794万吨,排名世界第一。但是中国人均牛肉年消费量远仍低于世界平均水平,因此未来还有大量提升空间。
  然而中国的养殖链并不能满足消费者增长的胃口。数据显示,截至2017年,肉牛的养殖主要以小规模养殖为主,年出栏数1000头的场户只占2%。与此同时,中国的肉牛养殖产业面对越来越高的土地、人工、饲料成本,增长养殖规模的动力减弱,导致近年来中国肉牛存栏量增速和市场需求增量之间的差距越来越大。

因此中国正规海关牛肉进口开始爆发性增长。海关总署1月23日发布数据,2018全年中国累计牛肉进口103.9万吨,而2010年,中国进口牛肉量仅为2.37万吨。农业部发布的报告预测,中国牛羊肉生产消费将在未来10年依旧保持增长,牛肉进口也会持续增加

信息技术和物流业的迅猛发展也让牛肉进口变得便捷

在上海工作的25岁飞行员柳弈来自西安,从小吃着秦川牛肉长大。而现在,柳弈经常从超市购买进口牛肉。“虽然进口肉不是很适合做中国菜,但是有时本土牛肉比如秦川牛肉和内蒙古牛肉比超市卖的进口牛肉还贵,所以平时会经常购买进口牛肉。”

2015年以来,南美牛肉逐渐成为中国进口牛肉的重要来源之一。数据来自阿根廷牛肉协会的海外市场推广主管Sergio Rey去年曾专门到北京推介阿根廷牛肉,在他口中,阿根廷牛肉得益于潘帕斯草原丰茂的牧草与无污染的环境,健康且安全。

郝娜介绍,尽管南美牛肉在肉质上稍逊于澳大利亚、新西兰等国牛肉,但因为价格低廉储量充足,所以进口量十分可观。

牛肉“情结

中国消费者常把牛肉与健康联系在一起,助推了牛肉消费在中国市场的繁荣

食物议题互联网分享平台“良食大学”的创始人简艺说,1984年奥运会第一次通过电视直播进入千家万户时,很多中国人都把外国运动员的体格高大归因为西方人吃牛肉喝牛奶的饮食习惯。他说这种想法如今在中国依然有市场,更有钱的中国人希望通过吃得更好达到更高的健康水平。

浙江大学食品科学与工程学朱加进教授告诉中外对话,牛肉蛋白质含量高,吸收效率高,并且血红素铁、钾、硒等微量元素含量较全,的确具有更高的营养价值。但另一方面,过多的摄入也易导致肥胖和心脑血管疾病等健康问题。显示,2013年时,澳大利亚牛肉还占据着中国进口牛肉量的一半,而到了2017年,南美牛肉占据了中国进口牛肉的70%。

Sunday, May 26, 2019

राहुल गांधी: क्या ये गांधी परिवार की राजनीति का अंत है?

गुरुवार को जब भारतीय आम चुनावों के नतीजे आए तो नरेंद्र मोदी इकतरफ़ा जीते के साथ विजेता के तौर पर उभरे. दूसरी ओर नेहरू-गांधी परिवार के उत्तराधिकारी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी एक पस्त, पराजित और हताश नेता के रूप में उभरे.
वो एक परम राजनीतिक वंश के मुख्य उत्तराधिकारी हैं. उनके परनाना, जवाहर लाल नेहरू भारत के पहले और सबसे ज़्यादा समय तक रहे प्रधानमंत्री हैं. उनकी दादी इंदिरा गांधी भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री थीं और उनके पिता राजीव गांधी भारत के सबसे युवा प्रधानमंत्री थे.
साल 2014 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने अपनी सबसे बुरी हार देखी थी. लेकिन गुरुवार को आए नतीजे राहुल गांधी के लिए दोहरा झटका लेकर आए. कांग्रेस सिर्फ़ 52 सीटें ही जीत सकीं. उनके मुकाबले में मोदी की भाजपा ने 300 से ज़्यादा सीटें जीतीं. इससे भी बुरा ये हुआ कि राहुल गांधी अपनी खानदानी सीट अमेठी भी हार बैठे.
हालांकि राहुल गांधी इस बार भी संसद में बैठेंगे क्योंकि वो केरल की वायनाड सीट से भी खड़े हुए थे और यहां से वो जीत गए हैं.
लेकिन अमेठी सम्मान की लड़ाई भी थी. इस सीट से उनके दोनो अभिभावक- मां सोनिया गांधी और पिता राजीव गांधी ने चुनाव लड़ा और जीता. वो स्वयं यहां से पंद्रह सालों से सांसद थे. राहुल गांधी ने अमेठी के प्रत्येक घर में एक विशेष पत्र भी भेजा था जिस पर लिखा था मेरा अमेठी परिवार. बावजूद उसके उन्हें शर्मनाक नतीजे का सामना करना पड़ा. अभिनेत्री से राजनेता बनीं बीजेपी की केंद्रीय मंत्री स्मृति इरानी ने उन्हें करारी शिकस्त दी.
अमेठी उत्तर प्रदेश के दिल सी है. उत्तर प्रदेश भारत का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है और दिल्ली की सत्ता का रास्ता यहीं से होकर जाता है. ये भारतीय राजनीति का ग्राउंड ज़ीरो भी हैं जहां किए गए प्रयोगों का असर पूरे देश में दिखाई भी देता है. आमतौर पर ये माना जाता रहा है कि जो यूपी जीतता है वही देश पर राज करता है.
भारत में हुए चौदह प्रधानमंत्रियों में से आठ यहीं से आए जिनमें राहुल गांधी के परनाना, दादी और पिता भी यहीं से जीते और प्रधानमंत्री बनें. 543 सांसदों की भारतीय संसद में से 80 सांसद यहीं से चुने जाते हैं.
मूल रूप से गुजरात के नरेंद्र मोदी ने भी साल 2014 में यूपी की ही वाराणसी सीट का प्रतिनिधित्व किया और इस बार भी वो यहीं से सांसद चुने गए हैं.
किसी को ये उम्मीद तो नहीं थी कि कांग्रेस लोकसभा चुनावों में सीधी जीत हासिल कर लेगी लेकिन ये माना जा रहा था कि कांग्रेस पहले से बेहतर तो करेगी ही. यही वजह है कि नतीजों ने पार्टी के लोगों के अलावा आम लोगों को भी चौंका दिया है.
राहुल गांधी भले ही संसद में रहे लेकिन अब ये सवाल पूछा जाने लगा है कि क्या ये कांग्रेस में गांधी युग का अंत है. या क्या पार्टी को फिर से पुनर्जीवित करने के लिए गांधी परिवार की राजनीति को ख़त्म ही कर दिया जाए.
हार के बाद राहुल गांधी ने पत्रकारों को संबोधित किया और हार की पूरी ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ली. उन्होंने हार स्वीकार करते हुए बीजेपी को मिले जनादेश का सम्मान किया.
अमेठी में वोटों की गिनती पूरी भी नहीं हुई थी. तीन लाख वोट और गिने जाने बाकी थे लेकिन उन्होंने हार स्वीकार करते हुए स्मृति से कहा- अमेठी का ख्याल रखना.
"मैं उन्हें मुबारकबाद देता हूं. वो जीत गई हैं. ये प्रजातंत्र हैं और मैं लोगों के फ़ैसले का सम्मान करता हूं."
कांग्रेस की हार पर उन्होंने ज़्यादा बाद नहीं की. उन्होंने कहा कि कहां ग़लती हुई इस बात पर चर्चा कांग्रेस की वर्किंग कमेटी की बैठक में की जाएगी.
उन्होंने कांग्रेस कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि उम्मीद न हारें. उन्होंने कहा, "डरने की ज़रूरत नहीं है, हम मेहनत करते रहेंगे और अंततः जीत हमारी ही होगी."
लेकिन लखनऊ में कांग्रेस के दफ़्तर में बैठकर टीवी से चिपकर कांग्रेस का 'कत्ल-ए-आम', जिसमें एक बाद एक कई बड़े नेता अपनी सीटें हारते जा रहे थे, देख रहे चुनिदां कार्यकर्ताओं के राहुल गांधी की भविष्य की ये जीत दूर की कौड़ी दिखाई देती है.
पार्टी के एक नेता ने कहा, "हमारी विश्वसनीयता बहुत घट गई है. लोगों को हमारे वादों पर भरोसा नहीं है. हम जो कह रहे हैं उस पर वो विश्वास नहीं कर रहे हैं."
"मोदी ने लोगों से जो वादे किए पूरे नहीं किए लेकिन फिर भी लोग मोदी का भरोसा करते हैं."
उन्होंने कहा, "हमें भी नहीं पता कि ऐसा क्यों हैं!"
चुनावी राजनीति में कांग्रेस के इस बेहद ख़राब प्रदर्शन से राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठने तय हैं और बहुत से विश्लेषक नेतृत्व बदलाव की बात भी करने लगे हैं. अध्यक्ष पद से उनका इस्तीफ़ा तक मांगा जा रहा है. लेकिन इस तरह की सभी मांगें पार्टी के बाहर से उठ रही हैं और पार्टी नेतृत्व इन्हें नकार ही देगा.
दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में ये चर्चा भी चली कि राहुल गांधी ने इस्तीफ़ा देने की पेशकश की है. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर ने बीबीसी से कहा, "कांग्रेस अपने नेतृत्व पर सवाल नहीं करेगी और अगर राहुल गांधी ने इस्तीफ़ा दिया भी तो उसे स्वीकार नहीं किया जाएगा."
अय्यर ने कहा कि पार्टी की हार के लिए नेतृत्व ज़िम्मेदार नहीं है. उन्होंने कहा, "हार के कारण अन्य हैं जिन पर हमें काम करना होगा."
लखनऊ में पार्टी के प्रवक्ता ब्रिजेंद्र कुमार सिंह समझाते हुए कहते हैं कि समस्या पार्टी का नेतृत्व नहीं है बल्कि अंदरूनी लड़ाई और ग़लत चुनावी मुद्दे चुनना हैं.
"पार्टी के ढांचे में कुछ कमज़ोरियां हैं. नेताओं में अंदरूनी लड़ाई भी है. ज़मीन पर हमारा चुनावी अभियान भी देरी से शुरू हुआ. हमारे प्रयास, भले ही नाकाम रहे, लेकिन यूपी और बिहार में क्षेत्रीय दलों के साथ मिलना एक ख़राब विचार था."
कांग्रेस के नेताओं ने अभी तक इस हार के लिए राहुल गांधी को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया है बल्कि वो इसके लिए पार्टी के ढांचे और चुनाव अभियान को ज़िम्मेदार ठहराते हैं.
निजी बातचीत में कांग्रेस के कई विश्लेषक ये भी मान लेते हैं कि मोदी के सामने व्यक्तित्व की स्पर्धा में राहुल गांधी हार रहे थे. ब्रांड मोदी उनके रास्ते की सबसे बड़ी रुकावट था.
सिंह कहते हैं, "प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले चुनावों में जो वादे किए थे भले ही वो उन्हें पूरा करने में नाकाम रहे हे बावजूद इसके वो अपनी सरकार की नीतियों के बारे में लोगों को भरोसे में लेने में कामयाब रहे."
ये पहली बार नहीं है जब मोदी के हाथों राहुल गांधी को इतनी बुरी हार मिली हो. 2014 के चुनावों में पार्टी को सिर्फ़ 44 सीटें ही मिली थी. लेकिन उस वक़्त भी राहुल को पूरी तरह ज़िम्मेदार नहीं ठहराया गया था.
इसके बाद हुए कई विधानसभा चुनावों में कई राज्यों में राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा. राहुल की ये कहकर आलोचना की गई कि वो ज़मीनी हक़ीक़त से दूर हैं और उन्हें कुछ भी नहीं पता है. सोशल मीडिया पर उन्हें पप्पू तक कहा गया, उनके मीम्स बनाए गए और वो हंसी का पात्र बनकर रह गए.
एक सामान्य परिवार से आने वाले नरेंद्र मोदी राहुल गांधी के वंश को लेकर उन पर लगातार निशाना साधते रहे. वो उन्हें अपनी रैलियों में नामदार कहकर संबोधित करते रहे. मोदी जनता को समझाते कि राहुल गांधी शीर्ष पर अपनी योग्यता के बल पर नहीं बल्कि अपने पारिवारिक संबंधों की वजह से पहुंचे हैं.
निजी बातचीत में कांग्रेस के कई कार्यकर्ता राहुल गांधी को एक ऐसा सरल व्यक्ति बताते हैं जिसके पास अपने चालाक प्रतिद्वंद्वी से निबटने की न इच्छा है और न ही चालाकी. तो क्या इसे सिर्फ़ राहुल गांधी की नाकामी माना जाए या गांधी ब्रांड की नाकामी?
भारतीय राजनीति में चमकते रहे नेहरू-गांधी नाम की चमक हाल के सालों में कुछ फीकी पड़ी है. ख़ासकर शहरी मतदाताओं और युवाओं ने इस नाम को ख़ारिज कर दिया है. नेहरू और इंदिरा गांधी के कार्यकला की उपलब्धियां उनके लिए अब कोई मायने नहीं रखते हैं.
वो कांग्रेस को साल 2004-2014 के शासनकाल से आंकते हैं. इस दौरान कांग्रेस के नेतृत्व की गठबंधन सरकार पर भ्रष्टाचार के कई गंभीर आरोप लगे. गुरुवार के नतीजों से लगता है कि कांग्रेस पर लगे ये आरोप अभी भी लोगों के ज़ेहन में ताज़ा हैं और वो उसे इसी नज़रिए से देखते हैं. राहुल गांधी अपने नज़रिए से भी आम मतदाताओं को नहीं जोड़ पाए.

Tuesday, May 14, 2019

अब ईरान को कौन बचाएगा, भारत से कैसी उम्मीदें

अमरीका ने ईरान से भारत को तेल ख़रीदने पर प्रतिबंधों में छूट दे रखी थी. ईरान पर अमरीका ने प्रतिबंधों को और कड़ा किया तो एक मई को यह छूट ख़त्म कर दी.
इस संकट के बीच ईरान के विदेश मंत्री मोहम्मद जावेद ज़रीफ़ सोमवार की देर रात नई दिल्ली पहुंचे हैं. ज़रीफ़ भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से मुलाक़ात करेंगे.
भारत को ईरान से तेल ख़रीदने पर मिली अमरीकी छूट ख़त्म होने का मतलब यह हुआ कि भारत चाहकर भी ईरान से तेल नहीं ख़रीद सकता है.
अगर भारत अमरीका के ख़िलाफ़ जाकर ईरान से तेल ख़रीदता है तो भारत पर अमरीका कई तरह का प्रतिबंध लगा सकता है. ज़रीफ़ और सुषमा स्वराज की मुलाक़ात में अमरीकी प्रतिबंधों से निपटने पर बातचीत हो सकती है.
दोनों नेताओं के बीच चाबाहार पोर्ट पर भी बात होगी क्योंकि अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप ने इस मामले में छूट कायम रखी है.
2019 में ज़रीफ़ का यह दूसरा भारत दौरा है. विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अभी अमरीका के ख़िलाफ़ नहीं जा सकता है. हाल ही में अमरीका ने आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के संस्थापक मसूद अज़हर को संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद से वैश्विक आतंकवादी घोषित कराने में खुलकर मदद की थी.
ईरानी तेल का भारत, चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा ख़रीदार है. अमरीकी प्रतिबंधों के बाद भारत ने इसमें कटौती कर दी थी और हर महीने 1.25 मिलियन टन की सीमा तय कर दी थी. 2017-18 में भारत ईरान से प्रतिवर्ष 22.6 मिलियन टन तेल ख़रीद रहा था.
पिछले गुरुवार को अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की शीर्ष के अधिकारियों के साथ बैठक हुई थी. कार्यकारी रक्षा मंत्री पैट्रिक शैनहन ने मध्य-पूर्व में अमरीकी सेना की योजना को पेश किया था. मध्य-पूर्व में अमरीका बड़ी संख्या में सैनिक भेजने पर गंभीरता से विचार कर रहा है. न्यू यॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार अमरीका मध्य-पूर्व में एक लाख 20 हज़ार सैनिक भेजने पर विचार कर रहा है और यह संख्या 2003 में अमरीका ने जब इराक़ पर हमला किया था, उसी के बराबर है.
क्या ट्रंप ईरान में सत्ता परिवर्तन करना चाहते हैं? इस पर ट्रंप का कहना है, ''हमलोग देख रहे हैं कि ईरान के साथ क्या होता है. अगर वो कुछ करते हैं तो उनकी यह बड़ी भूल होगी.''
भारत और ईरान के बीच दोस्ती के मुख्य रूप से दो आधार बताए जाते हैं. एक भारत की ऊर्जा ज़रूरतें हैं और दूसरा ईरान के बाद दुनिया में सबसे ज़्यादा शिया मुसलमानों का भारत में होना.
ईरान को लगता था कि भारत सद्दाम हुसैन के इराक़ के ज़्यादा क़रीब है क्योंकि अब तक भारत सबसे ज़्यादा तेल आयात इराक़ से करता आया है. गल्फ़ को-ऑपरेशन काउंसिल से आर्थिक संबंध और भारतीय कामगारों के साथ प्रबंधन के क्षेत्र से जुड़ी प्रतिभाओं के कारण अरब देशों से भारत के मज़बूत संबंध कायम हुए हैं.
भारत की ज़रूरतों के हिसाब से ईरान से तेल आपूर्ति कभी उत्साहजनक नहीं रही. इसके मुख्य कारण इस्लामिक क्रांति और इराक़-ईरान युद्ध रहे.
भारत भी ईरान से दोस्ती को मुक़ाम तक ले जाने में लंबे समय से हिचकता रहा है. 1991 में शीतयुद्ध ख़त्म होने के बाद सोवियत संघ का पतन हुआ तो दुनिया ने नई करवट ली. भारत के अमरीका से संबंध स्थापित हुए तो उसने भारत को ईरान के क़रीब आने से हमेशा रोका.
इराक़ के साथ युद्ध के बाद से ईरान अपनी सेना को मज़बूत करने में लग गया था. उसी के बाद से ईरान की चाहत परमाणु बम बनाने की रही है और उसने परमाणु कार्यक्रम शुरू भी कर दिया था.
अमरीका किसी सूरत में नहीं चाहता था कि ईरान परमाणु शक्ति संपन्न बने और मध्य-पूर्व में उसका दबदबा बढ़े. ऐसे में अमरीका ने इस बात के लिए ज़ोर लगाया कि ईरान के बाक़ी दुनिया से संबंध सामान्य न होने पाएं.

Friday, May 3, 2019

يحذر الخبراء من إمكانية أن تتسرب الأخطاء إلى عملية إعداد التقارير الخاصة بالفجوة

في العام الماضي تعرضت الكثير من الشركات الكبرى العاملة في مجال المحاماة وتقديم الخدمات المهنية - مثل المحاسبة والتدقيق والخدمات الهندسية وغيرها - لهجوم ضارٍ لادعائها بأن أصحاب الدخول الأعلى فيها، والذين يتألف غالبيتهم من الذكور، هم من "مُلاك" المؤسسة لا من "الموظفين" فيها، وهو ما يسمح بعدم وضعهم في الاعتبار، عند إجراء الحسابات الخاصة بتحديد حجم الفجوة القائمة بين أجور الرجال والنساء.
وفي وقت لاحق، رضخت تلك الشركات للضغوط الحكومية، وأعادت تصحيح أرقامها لكي تتضمن الرواتب التي يحصل عليها هؤلاء الأشخاص. رغم ذلك، فلا يزال لدى البعض منها مستشارون يتقاضون أجورا مرتفعة، دون أن يُدرجوا على كشوف رواتب الموظفين، لأن إدارات تلك الشركات تعتبر أن أولئك الأشخاص متعاقدون أو مستشارون من الخارج.
اللافت أن تضمين هذه الأرقام غير كاف، إذ أن الآليات الخاصة بالتحقق من دقة ما تنشره تلك الشركات لا تزال محدودة للغاية.
وفي العام الماضي، أجرت صحيفة "فاينانشال تايمز" تحقيقا استقصائيا أظهر أن واحدا من كل 20 تقريرا متعلقا بالفجوة في الأجور بين الجنسين تضمن بيانات غير محتملة الحدوث من الوجهة الإحصائية، وهو ما يرجح كونه غير دقيق.
فعلى سبيل المثال، ادعت 16 شركة أنها تدفع الراتب نفسه في المتوسط لموظفيها وموظفاتها دون تفرقة، وهو ما يعني انعدام الفجوة في الأجور بين الجنسين. غير أن الكثير من هذه الشركات - وبينها أسماء كبرى - أعادت تصحيح بياناتها وأرقامها في هذا الشأن.
وفي العام الجاري، أفصحت مئات الشركات عن بيانات لا تبدو محتملة بدورها من الناحية الإحصائية.
ورغم أنه يوجد في بريطانيا مفوضية حكومية تتولى المسؤولية عن تطبيق القانون الخاص بالكشف عن حجم الفجوة بين الرجال والنساء في الرواتب، فإن هيلين ريردون بوند تقول إن الصلاحيات الممنوحة لهذه المفوضية "عفا عليها الزمن إلى حد بعيد" ما يجعلها غير ملائمة للوفاء بمتطلبات عملية تحديد هذه الفجوة ونشر تفاصيلها.
وربما يجدر بنا الآن الاطلاع على رأي تشارلز كوتون، الخبير الاستشاري البارز في شؤون الأجور والمكافآت في معهد تشارتارد للأفراد والتنمية في المملكة المتحدة، وهو المعهد الذي يوفر للحكومة البريطانية أدلة ومعطيات تخص قضايا قانونية ترتبط بالأجور ومسألة إحالة العاملين إلى التقاعد، وملف رواتب التقاعد كذلك.
ويقول كوتون إنه يشعر بالقلق حيال مدى توخي الشركات الدقة حيال ملف التفاوت في الرواتب بين العاملين والعاملات فيها، رغم أنه يقر بأنه لم يطلع حتى الآن على أي أدلة تثبت تورط هذه المؤسسات في عملية التلاعب ببياناتها.
ويشير كوتون إلى أنه من السهل أن تتسلل الأخطاء إلى عملية إعداد التقارير الخاصة بهذا الأمر، خاصة إذا لم يكن هناك تنسيق بين الأقسام ذات الصلة بذلك الملف.
لكن البعض يتهمون الشركات والمؤسسات بأنها تكتفي بإبداء الاحترام الظاهري للقانون المطبق في هذا الشأن، دون القيام بأي إجراءات عملية للالتزام به.
شهدت السنوات الأخيرة تحول عشرات من المستثمرين الكبار في العالم، خاصة من العاملين في مجال إدارة الأصول في فرنسا، للتركيز على الاستثمار في صناديق تتوخى المسؤولية الاجتماعية، وتتجنب ضخ الأموال في الشركات التي تبيع المشروبات الكحولية والتبغ، أو تروج للمقامرة والحروب، أو تسهم في إحداث أضرار بيئية.
ومن الممكن أن يصبح ضمان وجود تنوع في قوة العمل في الشركات والمؤسسات هو الهدف التالي اللازم تحقيقه، إذا ما كنا نتحدث عن المعايير الأخلاقية التي يتم من خلالها تقييم الاستثمارات التي تقوم بها رؤوس الأموال الكبرى.
وفي فبراير/شباط الماضي، قالت مجموعة "هيرميس لإدارة صناديق الاستثمار"، وهي شركة استثمارية بارزة تتخذ من المملكة المتحدة مقرا لها، إنها ستتخذ موقفا أكثر صرامة من الشركات والمؤسسات التي لا تضمن التمثيل المتكافئ للرجال والنساء في مجالس إداراتها أو لجانها التنفيذية، وهو أمر قد تحذو شركات أخرى حذوه.
ويشير تشارلز كوتون إلى أن دولا مثل فرنسا وألمانيا تشكل نموذجا إيجابيا، على صعيد تحسين مستوى الشفافية ومن ثم إحداث التغييرات المنشودة على صعيد تقليص التفاوت بين الجنسين في الرواتب.
ويضيف: "بوسع أي موظف في ألمانيا أن يطلب مقارنة راتبه برواتب ستة من الموظفين المناظرين له ولكن من الجنس الآخر. وبمقدور الأفراد اللجوء إلى المحاكم إذا شعروا بأنهم يتعرضون للتمييز. ورغم أن ذلك لم يُستغل حتى الآن سوى من جانب عدد محدود من الأشخاص، فمن المرجح أن يتغير هذا الوضع مع تزايد عدد من يعرفون بتوافر مثل هذه الفرصة لهم".
أما في فرنسا، فيتم تقييم الشركات التي يصل عدد موظفيها إلى ألف شخص أو أكثر، على مقياس مؤلف من مئة درجة، بحسب مدى توافقها مع معايير من بينها تقليص الفجوة في الأجور بين الجنسين وآليات الترقي المتبعة فيها.
وتُمنح الشركات التي يقل معدلها في هذا الشأن عن 75 في المئة ثلاث سنوات لتحسين تصنيفها، وما لم تنجح في ذلك تفرض عليها غرامة تصل إلى واحد في المئة من قيمة الرواتب التي تمنحها.
كما أعلنت فرنسا أنها ستستحدث برنامج كمبيوتر خاصا لمراقبة كشوف الرواتب لدى الشركات المختلفة، للتعرف على مدى التفاوت في الأجور بين الجنسين.
وبحسب هيلين ريردون بوند المستشارة السابقة لدى الحكومة البريطانية، تتبوأ الدول الإسكندنافية مكانة متميزة على صعيد تقليص هذه الفجوة، من خلال ما توفره من رعاية شاملة للأطفال، وما هو موجود فيها من فرص للآباء والأمهات لنيل إجازة للعناية بالمواليد الجدد.
وتقول بوند إن مثل هذه الأمور تُحدث فارقا لأن الفجوة في الرواتب بين الجنسين غالبا ما تكون أكثر وضوحا وبروزا عندما تحصل الموظفات على عطلات ينقطعن فيها عن العمل من أجل تكوين أسرة.
وبالعودة إلى المملكة المتحدة، سنجد كوتون يعرب عن رغبته في وضع خطة متماسكة تستهدف تحقيق تقدم على صعيد تقليص أي تفاوت في الأجور بين الجنسين، ما يفسح المجال نحو مساءلة الشركات عن أدائها في هذا المضمار على نحو أكبر.
وينتقد كوتون مواصلة نحو ثلث الشركات تقديم البيانات الخاصة بذلك التفاوت، بدون تفسير للأرقام التي تتضمنها، وبمعزل عن البيانات الأخرى المتعلقة بعملها، قائلا إن تقليص تلك الفجوة يتطلب من أرباب العمل مراجعة "دورة حياة التوظيف والتشغيل" بأكملها.
ويضيف أن ذلك يعني "دراسة وفحص الممارسات المتعلقة بتوظيف عمال جدد والخاصة بالإبقاء على العمال الموجودين بالفعل في داخل المؤسسة، وكذلك تلك السياسات المرتبطة بالإدارة والتدريب والتطوير ومنح مكافآت وتقدير جهود الموظفين، جنبا إلى جنب مع مراجعة تصميم هيكل المؤسسة وطبيعة العمل فيها والوظائف أيضا".
ويقول كوتون إن "تحقيق تقدم طفيف في كل من هذه المجالات على حدة، قد يؤدي إلى فارق كبير بشكل عام".

Friday, March 29, 2019

ملياردير روسي يسترد يختا فارها خلال معركة قضائية على تسوية طلاق

استعاد رجل أعمال روسي يخته الذي تبلغ قيمته 436 مليون دولار أمريكي، في أحدث تطور بقضية تسوية طلاق مثيرة.
وأعلن فرهاد أحمدوف أن محكمة استئناف في دبي أبطلت قرارًا سابقًا بمصادرة يخته.
وكانت محكمة بريطانية أمرت في وقت سابق أحمدوف، بدفع 600 مليون دولار لزوجته في تسوية لقضية الطلاق.
لكن محكمة إماراتية قضت بإلغاء قرار مصادرة اليخت نظراً لصعوبة تنفيذه في دبي.
وصرح متحدث باسم الملياردير الروسي لصحيفة "غلف نيوز الإماراتية" أن " أحمدوف يشعر بالسرور، لكنه لم يفاجأ بقرار المحكمة اليوم لصالح شركته العائلية".
وأضاف أن محاولات زوجة أحمدوف السابقة للاستيلاء على أصوله كانت "مضللة مثل قرار محكمة العدل البريطانية".
ويُعتقد أن التسوية التي كانت في عام 2017، واحدة من أكبر تسويات قضايا الطلاق في تاريخ المملكة المتحدة.
ويصر أحمدوف على أنه طلق زوجته السابقة، تاتيانا أحمدوفا، في روسيا عام 2000.
ومع ذلك، قال القاضي هادون كيف إنه لم يعثر على أي دليل على ذلك، وخلص إلى أن وثائق الطلاق الأصلية كانت "مزورة".
وأمر القاضي بتجميد أصول أحمدوف في جميع أنحاء العالم لضمان حصول زوجته السابقة على أموالها المستحقة بموجب قرار المحكمة.
لكن محكمة الاستئناف في دبي قضت أنه من الخطأ حجز اليخت الضخم "لونا"، الذي كان مملوكاً في السابق للملياردير الروسي رومان أبراموفيتش.
كما أمرت تاتيانا أحمدوفا بدفع جميع التكاليف القانونية لزوجها السابق.
ويحمل كل من أحمدوف وزوجته السابقة الجنسية الروسية، إلا أن لديها إقامة دائمة في المملكة المتحدة.
أفرجت السلطات السعودية مؤقتا عن ثلاث ناشطات من بين 11 ناشطة محتجزات منذ أكثر من تسعة أشهر، وكانت تقارير أشارت إلى أن بعضهن أبلغ المحكمة بأنهن تعرضن للتعذيب والتحرش الجنسي خلال استجوابهن.
وأصدرت المحكمة الجزائية بالرياض أمرا بالإفراج المؤقت عن الناشطات: رقية المحارب وعزيزة اليوسف وإيمان النفجان، بعد تقدمهن بطلب الإفراج المؤقت للمحكمة، بحسب وكالة الأنباء السعودية.
وأشارت المحكمة فى قرارها إلى أنها ستواصل النظر في قضاياهن مع "حضورهن لجلسات المحاكمة مطلقات السراح لحين صدور الأحكام النهائية والمكتسبة للقطعية فيما نسب إليهن".
وكانت تقارير صحفية أفادت بأن الناشطات قدمن في ثاني جلسات محاكمتهن، التي منع من حضورها مراسلون أجانب ودبلوماسيون، ردودهن على اتهامات تقول جماعات حقوقية إن من بينها التواصل مع وسائل إعلام وهيئات حقوقية دولية.
ونقلت وكالة فرانس برس للأنباء عن شاهدي عيان إشارتهما إلى بكاء بعض الناشطات خلال المحاكمة لدى اتهامهن محققين بصعقهن بالكهرباء وجلدهن والتحرش جسديا بهن أثناء الاعتقال.
وقد تجمع أعضاء من عائلات الناشطات أمام هيئة المحكمة المؤلفة من ثلاثة قضاة في محكمة الرياض الجنائية.
ونقلت الوكالة ذاتها عن قريب لإحدى الناشطات قوله: إنها حاولت الانتحار بعدما تعرضت له من سوء المعاملة.
وتقول وكالة رويترز إن جماعات حقوقية أشارت إلى أن ثلاث من الناشطات على الأقل قد خضعن للحبس الانفرادي لشهور، وتعرضن للتعذيب الذي شمل الصعق الكهربائي والجلد والتحرش الجنسي.
وتواجه الحكومة السعودية رقابة دولية مكثفة بسبب سجلها الخاص بحقوق الإنسان، وتنكر الحكومة تعرض الناشطات للتعذيب أو التحرش.
وقال النائب العام السعودي إن مكتبه حقق في الادعاءات وخلص إلى أنها كاذبة.
وتعرضت النسوة الإحدى عشرة، وبينهن الناشطة البارزة لجين الهذلول والمدونة إيمان النفجان وأستاذة الجامعة هتون الفاسي والأكاديمية عزيزة اليوسف -التي هي في عقدها السادس-، للاعتقال الصيف الماضي في حملة موسعة ضد النشطاء قبل أسابيع من الرفع التاريخي لحظر دام عقودا على قيادة المرأة للسيارة في المملكة.
ورأى نشطاء ودبلوماسيون آنذاك أن توقيف الناشطات جاء بمثابة رسالة لنظرائهن بعدم الدفع بمطالب خارج أجندة الحكومة، لكن ولي العهد نفى ذلك، متهما الناشطات بالتعاون مع الاستخبارات القطرية والإيرانية.
وكانت الناشطات يطالبن منذ فترة طويلة بحق القيادة وإلغاء نظام الوصاية المقيِّد الذي يرينّ أنه يخوّل الأقارب الذكور سلطة تعسفية على النساء.
وجلبت محاكمة النسوة السعوديات نقدا مكثفا على المملكة بشأن حقوق الإنسان، في أعقاب موجة من الغضب العالمي جراء مقتل الصحفي جمال خاشقجي على أيدي وكلاء سعوديين في أكتوبر/تشرين الأول الماضي.
وادعى شقيق وشقيقة لجين، المقيمان بالخارج، أن سعود القحطاني - الذي أقيل من منصبه كأحد كبار مستشاري ولي العهد محمد بن سلمان بعد مقتل خاشقجي- أشرف على عمليات التعذيب.
وقال وليد الهذلول، شقيق لجين، لشبكة سي إن إن: "المستشار البارز لولي العهد كان يهدد باغتصاب أختي، وقتلها، وتقطيع جسدها إلى أشلاء. هذا هو الشخص الذي كان ينبغي أن يمثل اليوم أمام المحكمة، وليس أختي".
ولم يظهر القحطاني للعلن منذ إعلان إقالته.
وقالت جماعة القسط الحقوقية السعودية ومقرها لندن، إن الحالة الصحية لـ نوف عبد العزيز، إحدى المعتقلات شهدت تدهورا مؤخرا، دون توضيح السبب. وأفاد مصدر بأن نوف لم تظهر في ساحة المحكمة.
ونقلت فرانس برس عن أقارب المعتقلات، أن عددا منهن تقدم بالتماس للحصول على الإفراج بكفالة، وأضافوا بأن المحاكمة ستُستأنف في الثالث من أبريل/نيسان.
وإبان توقيف الناشطات، اتهمهن مسؤولون سعوديون بالتواصل مع وكالات استخبارات أجنبية، بينما وصفتهن وسائل الإعلام المدعومة حكوميا بالخائنات و"عميلات السفارات".
وكان مكتب النائب العام قال في مايو/آيار الماضي، إن عددا من النساء والرجال أوقفوا للاشتباه في الإضرار بمصالح السعودية وتقديم الدعم لعناصر عدائية في الخارج.
ولم يرِد مع ذلك في لوائح الاتهام ذِكْر لأي اتصال مع وكالات استخبارات أجنبية، حسبما قال نشطاء اطلعوا على الوثائق.
وتندرج بعض الاتهامات الموجهة للنسوة تحت طائلة قانون الجرائم المعلوماتية في المملكة، والذي ينص على عقوبة بالسجن تصل إلى خمس سنوات.
وقال وليد الهذلول إن شقيقته طلبت من المحكمة إمهالها شهرا للرد على الاتهامات، قائلة إنها لم تُعط الوقت الكافي للاستعداد.
وأضاف وليد بأن أسرته مُنعت من اصطحاب وثائق قانونية مكتوبة إلى داخل زنزانة شقيقته.
ولم يتضح كيف استجابت المحكمة لطلب لجين.
وكان متوقعا في البداية أن تمْثُل النسوة المعتقلات أمام محكمة أنشئت خصيصا للفصل في قضايا تتعلق بالإرهاب.
لكن القضية أحيلت إلى المحكمة الجنائية في آخر لحظة، دون أي تفسير، بعد شهور من انتقادات غربية.
وقد فتح ذلك الباب أمام تكهنات بأن تفضي المحاكمة إلى إخلاء سبيل النسوة بعد أن أشعلت الحملة ضد الناشطات انتقادات دولية ضد ولي العهد والحاكم الفعلي للمملكة.
وبحسب أقاربهن، فقد حُملت مؤخرا بعض النسوة المعتقلات، وبينهن لجين، على توقيع خطابات في محبسهن لطلب عفو ملكي من الملك سلمان بن عبد العزيز.
ومارست دول غربية، بينها بريطانيا والولايات المتحدة وكافة دول الاتحاد الأوروبي وكندا وأستراليا، ضغوطا متزايدة على المملكة السعودية للإفراج عن الناشطات.
وأثار وزير الخارجية البريطاني جيريمي هانت، ونظيره الأمريكي مايك بومبيو، القضية أثناء زيارات قاما بها مؤخرا إلى المملكة.
وكتب تسعة أعضاء بارزين بمجلس الشيوخ الأمريكي خطابا إلى الملك سلمان يناشدونه بالإفراج الفوري عن السجناء المحتجزين على خلفية "اتهامات مشكوك فيها تتعلق بنشاطهم"، مشيرين إلى العديد من النسوة اللائي يخضعن للمحاكمة.