2019年2月的春节假期结束后不久,北京新发地农产品批发市场牛羊肉大厅里又热闹起来。新发地被称为北京市的“菜篮子”,因为食材新鲜又便宜,很多市民会驱车到此采购。45岁的牛羊肉店主李成从事牛羊肉销售十多年,他说,“12月之后,牛肉价格几乎天天涨。”
近年来,中国牛肉消费需求的增长让国内肉牛养殖产业有些跟不上了。在水涨船高的牛肉价格和巨大的供需缺口推动下,牛肉市场成了进口贸易商眼中的一块“肥肉”。逐年增加的进口牛肉背后有市场因素的推动,也是中国民众食物消费观念与结构转变的缩影。
进口牛肉来了
农业农村部监测显示,2018年夏天开始,中国市场牛肉价格持续上涨,即使2019年春节后有所下降,截至三月初,牛肉批发价格相比于2018年初已经累积上涨超过11%。
一家新西兰进出口贸易公司 的CEO郝娜告诉中外对话,这轮牛肉价格浮动和非洲猪瘟造成的猪肉供应量减少、鸡肉价格飙升存在一定关联,但是更长久的原因在于国内牛肉供需的不平衡。
2000年之后,中国家庭收入增长促进了肉类食品消费量,2017年中国牛肉消费量已达到794万吨,排名世界第一。但是中国人均牛肉年消费量远仍低于世界平均水平,因此未来还有大量提升空间。
然而中国的养殖链并不能满足消费者增长的胃口。数据显示,截至2017年,肉牛的养殖主要以小规模养殖为主,年出栏数1000头的场户只占2%。与此同时,中国的肉牛养殖产业面对越来越高的土地、人工、饲料成本,增长养殖规模的动力减弱,导致近年来中国肉牛存栏量增速和市场需求增量之间的差距越来越大。
因此中国正规海关牛肉进口开始爆发性增长。海关总署1月23日发布数据,2018全年中国累计牛肉进口103.9万吨,而2010年,中国进口牛肉量仅为2.37万吨。农业部发布的报告预测,中国牛羊肉生产消费将在未来10年依旧保持增长,牛肉进口也会持续增加。
信息技术和物流业的迅猛发展也让牛肉进口变得便捷。
在上海工作的25岁飞行员柳弈来自西安,从小吃着秦川牛肉长大。而现在,柳弈经常从超市购买进口牛肉。“虽然进口肉不是很适合做中国菜,但是有时本土牛肉比如秦川牛肉和内蒙古牛肉比超市卖的进口牛肉还贵,所以平时会经常购买进口牛肉。”
2015年以来,南美牛肉逐渐成为中国进口牛肉的重要来源之一。数据来自阿根廷牛肉协会的海外市场推广主管Sergio Rey去年曾专门到北京推介阿根廷牛肉,在他口中,阿根廷牛肉得益于潘帕斯草原丰茂的牧草与无污染的环境,健康且安全。
郝娜介绍,尽管南美牛肉在肉质上稍逊于澳大利亚、新西兰等国牛肉,但因为价格低廉储量充足,所以进口量十分可观。
牛肉“情结”
中国消费者常把牛肉与健康联系在一起,助推了牛肉消费在中国市场的繁荣。
食物议题互联网分享平台“良食大学”的创始人简艺说,1984年奥运会第一次通过电视直播进入千家万户时,很多中国人都把外国运动员的体格高大归因为西方人吃牛肉喝牛奶的饮食习惯。他说这种想法如今在中国依然有市场,更有钱的中国人希望通过吃得更好达到更高的健康水平。
浙江大学食品科学与工程学朱加进教授告诉中外对话,牛肉蛋白质含量高,吸收效率高,并且血红素铁、钾、硒等微量元素含量较全,的确具有更高的营养价值。但另一方面,过多的摄入也易导致肥胖和心脑血管疾病等健康问题。显示,2013年时,澳大利亚牛肉还占据着中国进口牛肉量的一半,而到了2017年,南美牛肉占据了中国进口牛肉的70%。
Wednesday, June 19, 2019
Sunday, May 26, 2019
राहुल गांधी: क्या ये गांधी परिवार की राजनीति का अंत है?
गुरुवार को जब भारतीय आम चुनावों के नतीजे आए तो नरेंद्र मोदी इकतरफ़ा जीते के साथ विजेता के तौर पर उभरे.
दूसरी ओर नेहरू-गांधी परिवार के उत्तराधिकारी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी एक पस्त, पराजित और हताश नेता के रूप में उभरे.
वो
एक परम राजनीतिक वंश के मुख्य उत्तराधिकारी हैं. उनके परनाना, जवाहर लाल नेहरू भारत के पहले और सबसे ज़्यादा समय तक रहे प्रधानमंत्री हैं. उनकी
दादी इंदिरा गांधी भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री थीं और उनके पिता राजीव गांधी भारत के सबसे युवा प्रधानमंत्री थे.साल 2014 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने अपनी सबसे बुरी हार देखी थी. लेकिन गुरुवार को आए नतीजे राहुल गांधी के लिए दोहरा झटका लेकर आए. कांग्रेस सिर्फ़ 52 सीटें ही जीत सकीं. उनके मुकाबले में मोदी की भाजपा ने 300 से ज़्यादा सीटें जीतीं. इससे भी बुरा ये हुआ कि राहुल गांधी अपनी खानदानी सीट अमेठी भी हार बैठे.
हालांकि राहुल गांधी इस बार भी संसद में बैठेंगे क्योंकि वो केरल की वायनाड सीट से भी खड़े हुए थे और यहां से वो जीत गए हैं.
लेकिन अमेठी सम्मान की लड़ाई भी थी. इस सीट से उनके दोनो अभिभावक- मां सोनिया गांधी और पिता राजीव गांधी ने चुनाव लड़ा और जीता. वो स्वयं यहां से पंद्रह सालों से सांसद थे. राहुल गांधी ने अमेठी के प्रत्येक घर में एक विशेष पत्र भी भेजा था जिस पर लिखा था मेरा अमेठी परिवार. बावजूद उसके उन्हें शर्मनाक नतीजे का सामना करना पड़ा. अभिनेत्री से राजनेता बनीं बीजेपी की केंद्रीय मंत्री स्मृति इरानी ने उन्हें करारी शिकस्त दी.
अमेठी उत्तर प्रदेश के दिल सी है. उत्तर प्रदेश भारत का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है और दिल्ली की सत्ता का रास्ता यहीं से होकर जाता है. ये भारतीय राजनीति का ग्राउंड ज़ीरो भी हैं जहां किए गए प्रयोगों का असर पूरे देश में दिखाई भी देता है. आमतौर पर ये माना जाता रहा है कि जो यूपी जीतता है वही देश पर राज करता है.
भारत में हुए चौदह प्रधानमंत्रियों में से आठ यहीं से आए जिनमें राहुल गांधी के परनाना, दादी और पिता भी यहीं से जीते और प्रधानमंत्री बनें. 543 सांसदों की भारतीय संसद में से 80 सांसद यहीं से चुने जाते हैं.
मूल रूप से गुजरात के नरेंद्र मोदी ने भी साल 2014 में यूपी की ही वाराणसी सीट का प्रतिनिधित्व किया और इस बार भी वो यहीं से सांसद चुने गए हैं.
किसी को ये उम्मीद तो नहीं थी कि कांग्रेस लोकसभा चुनावों में सीधी जीत हासिल कर लेगी लेकिन ये माना जा रहा था कि कांग्रेस पहले से बेहतर तो करेगी ही. यही वजह है कि नतीजों ने पार्टी के लोगों के अलावा आम लोगों को भी चौंका दिया है.
राहुल गांधी भले ही संसद में रहे लेकिन अब ये सवाल पूछा जाने लगा है कि क्या ये कांग्रेस में गांधी युग का अंत है. या क्या पार्टी को फिर से पुनर्जीवित करने के लिए गांधी परिवार की राजनीति को ख़त्म ही कर दिया जाए.
हार के बाद राहुल गांधी ने पत्रकारों को संबोधित किया और हार की पूरी ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ली. उन्होंने हार स्वीकार करते हुए बीजेपी को मिले जनादेश का सम्मान किया.
अमेठी में वोटों की गिनती पूरी भी नहीं हुई थी. तीन लाख वोट और गिने जाने बाकी थे लेकिन उन्होंने हार स्वीकार करते हुए स्मृति से कहा- अमेठी का ख्याल रखना.
"मैं उन्हें मुबारकबाद देता हूं. वो जीत गई हैं. ये प्रजातंत्र हैं और मैं लोगों के फ़ैसले का सम्मान करता हूं."
कांग्रेस की हार पर उन्होंने ज़्यादा बाद नहीं की. उन्होंने कहा कि कहां ग़लती हुई इस बात पर चर्चा कांग्रेस की वर्किंग कमेटी की बैठक में की जाएगी.
उन्होंने कांग्रेस कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि उम्मीद न हारें. उन्होंने कहा, "डरने की ज़रूरत नहीं है, हम मेहनत करते रहेंगे और अंततः जीत हमारी ही होगी."
लेकिन लखनऊ में कांग्रेस के दफ़्तर में बैठकर टीवी से चिपकर कांग्रेस का 'कत्ल-ए-आम', जिसमें एक बाद एक कई बड़े नेता अपनी सीटें हारते जा रहे थे, देख रहे चुनिदां कार्यकर्ताओं के राहुल गांधी की भविष्य की ये जीत दूर की कौड़ी दिखाई देती है.
पार्टी के एक नेता ने कहा, "हमारी विश्वसनीयता बहुत घट गई है. लोगों को हमारे वादों पर भरोसा नहीं है. हम जो कह रहे हैं उस पर वो विश्वास नहीं कर रहे हैं."
"मोदी ने लोगों से जो वादे किए पूरे नहीं किए लेकिन फिर भी लोग मोदी का भरोसा करते हैं."
उन्होंने कहा, "हमें भी नहीं पता कि ऐसा क्यों हैं!"
चुनावी राजनीति में कांग्रेस के इस बेहद ख़राब प्रदर्शन से राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठने तय हैं और बहुत से विश्लेषक नेतृत्व बदलाव की बात भी करने लगे हैं. अध्यक्ष पद से उनका इस्तीफ़ा तक मांगा जा रहा है. लेकिन इस तरह की सभी मांगें पार्टी के बाहर से उठ रही हैं और पार्टी नेतृत्व इन्हें नकार ही देगा.
दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में ये चर्चा भी चली कि राहुल गांधी ने इस्तीफ़ा देने की पेशकश की है. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर ने बीबीसी से कहा, "कांग्रेस अपने नेतृत्व पर सवाल नहीं करेगी और अगर राहुल गांधी ने इस्तीफ़ा दिया भी तो उसे स्वीकार नहीं किया जाएगा."
अय्यर ने कहा कि पार्टी की हार के लिए नेतृत्व ज़िम्मेदार नहीं है. उन्होंने कहा, "हार के कारण अन्य हैं जिन पर हमें काम करना होगा."
लखनऊ में पार्टी के प्रवक्ता ब्रिजेंद्र कुमार सिंह समझाते हुए कहते हैं कि समस्या पार्टी का नेतृत्व नहीं है बल्कि अंदरूनी लड़ाई और ग़लत चुनावी मुद्दे चुनना हैं.
"पार्टी के ढांचे में कुछ कमज़ोरियां हैं. नेताओं में अंदरूनी लड़ाई भी है. ज़मीन पर हमारा चुनावी अभियान भी देरी से शुरू हुआ. हमारे प्रयास, भले ही नाकाम रहे, लेकिन यूपी और बिहार में क्षेत्रीय दलों के साथ मिलना एक ख़राब विचार था."
कांग्रेस के नेताओं ने अभी तक इस हार के लिए राहुल गांधी को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया है बल्कि वो इसके लिए पार्टी के ढांचे और चुनाव अभियान को ज़िम्मेदार ठहराते हैं.
निजी बातचीत में कांग्रेस के कई विश्लेषक ये भी मान लेते हैं कि मोदी के सामने व्यक्तित्व की स्पर्धा में राहुल गांधी हार रहे थे. ब्रांड मोदी उनके रास्ते की सबसे बड़ी रुकावट था.
सिंह कहते हैं, "प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले चुनावों में जो वादे किए थे भले ही वो उन्हें पूरा करने में नाकाम रहे हे बावजूद इसके वो अपनी सरकार की नीतियों के बारे में लोगों को भरोसे में लेने में कामयाब रहे."
ये पहली बार नहीं है जब मोदी के हाथों राहुल गांधी को इतनी बुरी हार मिली हो. 2014 के चुनावों में पार्टी को सिर्फ़ 44 सीटें ही मिली थी. लेकिन उस वक़्त भी राहुल को पूरी तरह ज़िम्मेदार नहीं ठहराया गया था.
इसके बाद हुए कई विधानसभा चुनावों में कई राज्यों में राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा. राहुल की ये कहकर आलोचना की गई कि वो ज़मीनी हक़ीक़त से दूर हैं और उन्हें कुछ भी नहीं पता है. सोशल मीडिया पर उन्हें पप्पू तक कहा गया, उनके मीम्स बनाए गए और वो हंसी का पात्र बनकर रह गए.
एक सामान्य परिवार से आने वाले नरेंद्र मोदी राहुल गांधी के वंश को लेकर उन पर लगातार निशाना साधते रहे. वो उन्हें अपनी रैलियों में नामदार कहकर संबोधित करते रहे. मोदी जनता को समझाते कि राहुल गांधी शीर्ष पर अपनी योग्यता के बल पर नहीं बल्कि अपने पारिवारिक संबंधों की वजह से पहुंचे हैं.
निजी बातचीत में कांग्रेस के कई कार्यकर्ता राहुल गांधी को एक ऐसा सरल व्यक्ति बताते हैं जिसके पास अपने चालाक प्रतिद्वंद्वी से निबटने की न इच्छा है और न ही चालाकी. तो क्या इसे सिर्फ़ राहुल गांधी की नाकामी माना जाए या गांधी ब्रांड की नाकामी?
भारतीय राजनीति में चमकते रहे नेहरू-गांधी नाम की चमक हाल के सालों में कुछ फीकी पड़ी है. ख़ासकर शहरी मतदाताओं और युवाओं ने इस नाम को ख़ारिज कर दिया है. नेहरू और इंदिरा गांधी के कार्यकला की उपलब्धियां उनके लिए अब कोई मायने नहीं रखते हैं.
वो कांग्रेस को साल 2004-2014 के शासनकाल से आंकते हैं. इस दौरान कांग्रेस के नेतृत्व की गठबंधन सरकार पर भ्रष्टाचार के कई गंभीर आरोप लगे. गुरुवार के नतीजों से लगता है कि कांग्रेस पर लगे ये आरोप अभी भी लोगों के ज़ेहन में ताज़ा हैं और वो उसे इसी नज़रिए से देखते हैं. राहुल गांधी अपने नज़रिए से भी आम मतदाताओं को नहीं जोड़ पाए.
Tuesday, May 14, 2019
अब ईरान को कौन बचाएगा, भारत से कैसी उम्मीदें
अमरीका ने ईरान से भारत को तेल ख़रीदने पर प्रतिबंधों में छूट दे रखी थी. ईरान पर अमरीका ने प्रतिबंधों को
और कड़ा किया तो एक मई को यह छूट ख़त्म कर दी.
इस संकट के बीच ईरान
के विदेश मंत्री मोहम्मद जावेद ज़रीफ़ सोमवार की देर रात नई दिल्ली पहुंचे
हैं. ज़रीफ़ भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से मुलाक़ात करेंगे. भारत को ईरान से तेल ख़रीदने पर मिली अमरीकी छूट ख़त्म होने का मतलब यह हुआ कि भारत चाहकर भी ईरान से तेल नहीं ख़रीद सकता है.
अगर भारत अमरीका के ख़िलाफ़ जाकर ईरान से तेल ख़रीदता है तो भारत पर अमरीका कई तरह का प्रतिबंध लगा सकता है. ज़रीफ़ और सुषमा स्वराज की मुलाक़ात में अमरीकी प्रतिबंधों से निपटने पर बातचीत हो सकती है.
दोनों नेताओं के बीच चाबाहार पोर्ट पर भी बात होगी क्योंकि अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप ने इस मामले में छूट कायम रखी है.
2019 में ज़रीफ़ का यह दूसरा भारत दौरा है. विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अभी अमरीका के ख़िलाफ़ नहीं जा सकता है. हाल ही में अमरीका ने आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के संस्थापक मसूद अज़हर को संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद से वैश्विक आतंकवादी घोषित कराने में खुलकर मदद की थी.
ईरानी तेल का भारत, चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा ख़रीदार है. अमरीकी प्रतिबंधों के बाद भारत ने इसमें कटौती कर दी थी और हर महीने 1.25 मिलियन टन की सीमा तय कर दी थी. 2017-18 में भारत ईरान से प्रतिवर्ष 22.6 मिलियन टन तेल ख़रीद रहा था.
पिछले गुरुवार को अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की शीर्ष के अधिकारियों के साथ बैठक हुई थी. कार्यकारी रक्षा मंत्री पैट्रिक शैनहन ने मध्य-पूर्व में अमरीकी सेना की योजना को पेश किया था. मध्य-पूर्व में अमरीका बड़ी संख्या में सैनिक भेजने पर गंभीरता से विचार कर रहा है. न्यू यॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार अमरीका मध्य-पूर्व में एक लाख 20 हज़ार सैनिक भेजने पर विचार कर रहा है और यह संख्या 2003 में अमरीका ने जब इराक़ पर हमला किया था, उसी के बराबर है.
क्या ट्रंप ईरान में सत्ता परिवर्तन करना चाहते हैं? इस पर ट्रंप का कहना है, ''हमलोग देख रहे हैं कि ईरान के साथ क्या होता है. अगर वो कुछ करते हैं तो उनकी यह बड़ी भूल होगी.''
भारत और ईरान के बीच दोस्ती के मुख्य रूप से दो आधार बताए जाते हैं. एक भारत की ऊर्जा ज़रूरतें हैं और दूसरा ईरान के बाद दुनिया में सबसे ज़्यादा शिया मुसलमानों का भारत में होना.
ईरान को लगता था कि भारत सद्दाम हुसैन के इराक़ के ज़्यादा क़रीब है क्योंकि अब तक भारत सबसे ज़्यादा तेल आयात इराक़ से करता आया है. गल्फ़ को-ऑपरेशन काउंसिल से आर्थिक संबंध और भारतीय कामगारों के साथ प्रबंधन के क्षेत्र से जुड़ी प्रतिभाओं के कारण अरब देशों से भारत के मज़बूत संबंध कायम हुए हैं.
भारत की ज़रूरतों के हिसाब से ईरान से तेल आपूर्ति कभी उत्साहजनक नहीं रही. इसके मुख्य कारण इस्लामिक क्रांति और इराक़-ईरान युद्ध रहे.
भारत भी ईरान से दोस्ती को मुक़ाम तक ले जाने में लंबे समय से हिचकता रहा है. 1991 में शीतयुद्ध ख़त्म होने के बाद सोवियत संघ का पतन हुआ तो दुनिया ने नई करवट ली. भारत के अमरीका से संबंध स्थापित हुए तो उसने भारत को ईरान के क़रीब आने से हमेशा रोका.
इराक़ के साथ युद्ध के बाद से ईरान अपनी सेना को मज़बूत करने में लग गया था. उसी के बाद से ईरान की चाहत परमाणु बम बनाने की रही है और उसने परमाणु कार्यक्रम शुरू भी कर दिया था.
अमरीका किसी सूरत में नहीं चाहता था कि ईरान परमाणु शक्ति संपन्न बने और मध्य-पूर्व में उसका दबदबा बढ़े. ऐसे में अमरीका ने इस बात के लिए ज़ोर लगाया कि ईरान के बाक़ी दुनिया से संबंध सामान्य न होने पाएं.
Friday, May 3, 2019
يحذر الخبراء من إمكانية أن تتسرب الأخطاء إلى عملية إعداد التقارير الخاصة بالفجوة
في العام الماضي تعرضت الكثير من الشركات الكبرى العاملة في مجال المحاماة وتقديم الخدمات المهنية - مثل المحاسبة والتدقيق والخدمات
الهندسية وغيرها - لهجوم ضارٍ لادعائها بأن أصحاب الدخول الأعلى فيها،
والذين يتألف غالبيتهم من الذكور، هم من "مُلاك" المؤسسة لا من "الموظفين"
فيها، وهو ما يسمح بعدم وضعهم في الاعتبار، عند إجراء الحسابات الخاصة بتحديد حجم الفجوة القائمة بين أجور الرجال والنساء.
وفي وقت لاحق، رضخت تلك الشركات للضغوط الحكومية، وأعادت تصحيح أرقامها لكي تتضمن الرواتب التي يحصل عليها هؤلاء الأشخاص. رغم ذلك، فلا يزال لدى البعض منها مستشارون يتقاضون أجورا مرتفعة، دون أن يُدرجوا على كشوف رواتب الموظفين، لأن إدارات تلك الشركات تعتبر أن أولئك الأشخاص متعاقدون أو مستشارون من الخارج.
اللافت أن تضمين هذه الأرقام غير كاف، إذ أن الآليات الخاصة بالتحقق من دقة ما تنشره تلك الشركات لا تزال محدودة للغاية.
وفي العام الماضي، أجرت صحيفة "فاينانشال تايمز" تحقيقا استقصائيا أظهر أن واحدا من كل 20 تقريرا متعلقا بالفجوة في الأجور بين الجنسين تضمن بيانات غير محتملة الحدوث من الوجهة الإحصائية، وهو ما يرجح كونه غير دقيق.
فعلى سبيل المثال، ادعت 16 شركة أنها تدفع الراتب نفسه في المتوسط لموظفيها وموظفاتها دون تفرقة، وهو ما يعني انعدام الفجوة في الأجور بين الجنسين. غير أن الكثير من هذه الشركات - وبينها أسماء كبرى - أعادت تصحيح بياناتها وأرقامها في هذا الشأن.
وفي العام الجاري، أفصحت مئات الشركات عن بيانات لا تبدو محتملة بدورها من الناحية الإحصائية.
ورغم أنه يوجد في بريطانيا مفوضية حكومية تتولى المسؤولية عن تطبيق القانون الخاص بالكشف عن حجم الفجوة بين الرجال والنساء في الرواتب، فإن هيلين ريردون بوند تقول إن الصلاحيات الممنوحة لهذه المفوضية "عفا عليها الزمن إلى حد بعيد" ما يجعلها غير ملائمة للوفاء بمتطلبات عملية تحديد هذه الفجوة ونشر تفاصيلها.
وربما يجدر بنا الآن الاطلاع على رأي تشارلز كوتون، الخبير الاستشاري البارز في شؤون الأجور والمكافآت في معهد تشارتارد للأفراد والتنمية في المملكة المتحدة، وهو المعهد الذي يوفر للحكومة البريطانية أدلة ومعطيات تخص قضايا قانونية ترتبط بالأجور ومسألة إحالة العاملين إلى التقاعد، وملف رواتب التقاعد كذلك.
ويقول كوتون إنه يشعر بالقلق حيال مدى توخي الشركات الدقة حيال ملف التفاوت في الرواتب بين العاملين والعاملات فيها، رغم أنه يقر بأنه لم يطلع حتى الآن على أي أدلة تثبت تورط هذه المؤسسات في عملية التلاعب ببياناتها.
ويشير كوتون إلى أنه من السهل أن تتسلل الأخطاء إلى عملية إعداد التقارير الخاصة بهذا الأمر، خاصة إذا لم يكن هناك تنسيق بين الأقسام ذات الصلة بذلك الملف.
لكن البعض يتهمون الشركات والمؤسسات بأنها تكتفي بإبداء الاحترام الظاهري للقانون المطبق في هذا الشأن، دون القيام بأي إجراءات عملية للالتزام به.
شهدت السنوات الأخيرة تحول عشرات من المستثمرين الكبار في العالم، خاصة من العاملين في مجال إدارة الأصول في فرنسا، للتركيز على الاستثمار في صناديق تتوخى المسؤولية الاجتماعية، وتتجنب ضخ الأموال في الشركات التي تبيع المشروبات الكحولية والتبغ، أو تروج للمقامرة والحروب، أو تسهم في إحداث أضرار بيئية.
ومن الممكن أن يصبح ضمان وجود تنوع في قوة العمل في الشركات والمؤسسات هو الهدف التالي اللازم تحقيقه، إذا ما كنا نتحدث عن المعايير الأخلاقية التي يتم من خلالها تقييم الاستثمارات التي تقوم بها رؤوس الأموال الكبرى.
وفي فبراير/شباط الماضي، قالت مجموعة "هيرميس لإدارة صناديق الاستثمار"، وهي شركة استثمارية بارزة تتخذ من المملكة المتحدة مقرا لها، إنها ستتخذ موقفا أكثر صرامة من الشركات والمؤسسات التي لا تضمن التمثيل المتكافئ للرجال والنساء في مجالس إداراتها أو لجانها التنفيذية، وهو أمر قد تحذو شركات أخرى حذوه.
ويشير تشارلز كوتون إلى أن دولا مثل فرنسا وألمانيا تشكل نموذجا إيجابيا، على صعيد تحسين مستوى الشفافية ومن ثم إحداث التغييرات المنشودة على صعيد تقليص التفاوت بين الجنسين في الرواتب.
ويضيف: "بوسع أي موظف في ألمانيا أن يطلب مقارنة راتبه برواتب ستة من الموظفين المناظرين له ولكن من الجنس الآخر. وبمقدور الأفراد اللجوء إلى المحاكم إذا شعروا بأنهم يتعرضون للتمييز. ورغم أن ذلك لم يُستغل حتى الآن سوى من جانب عدد محدود من الأشخاص، فمن المرجح أن يتغير هذا الوضع مع تزايد عدد من يعرفون بتوافر مثل هذه الفرصة لهم".
أما في فرنسا، فيتم تقييم الشركات التي يصل عدد موظفيها إلى ألف شخص أو أكثر، على مقياس مؤلف من مئة درجة، بحسب مدى توافقها مع معايير من بينها تقليص الفجوة في الأجور بين الجنسين وآليات الترقي المتبعة فيها.
وتُمنح الشركات التي يقل معدلها في هذا الشأن عن 75 في المئة ثلاث سنوات لتحسين تصنيفها، وما لم تنجح في ذلك تفرض عليها غرامة تصل إلى واحد في المئة من قيمة الرواتب التي تمنحها.
كما أعلنت فرنسا أنها ستستحدث برنامج كمبيوتر خاصا لمراقبة كشوف الرواتب لدى الشركات المختلفة، للتعرف على مدى التفاوت في الأجور بين الجنسين.
وبحسب هيلين ريردون بوند المستشارة السابقة لدى الحكومة البريطانية، تتبوأ الدول الإسكندنافية مكانة متميزة على صعيد تقليص هذه الفجوة، من خلال ما توفره من رعاية شاملة للأطفال، وما هو موجود فيها من فرص للآباء والأمهات لنيل إجازة للعناية بالمواليد الجدد.
وتقول بوند إن مثل هذه الأمور تُحدث فارقا لأن الفجوة في الرواتب بين الجنسين غالبا ما تكون أكثر وضوحا وبروزا عندما تحصل الموظفات على عطلات ينقطعن فيها عن العمل من أجل تكوين أسرة.
وبالعودة إلى المملكة المتحدة، سنجد كوتون يعرب عن رغبته في وضع خطة متماسكة تستهدف تحقيق تقدم على صعيد تقليص أي تفاوت في الأجور بين الجنسين، ما يفسح المجال نحو مساءلة الشركات عن أدائها في هذا المضمار على نحو أكبر.
وينتقد كوتون مواصلة نحو ثلث الشركات تقديم البيانات الخاصة بذلك التفاوت، بدون تفسير للأرقام التي تتضمنها، وبمعزل عن البيانات الأخرى المتعلقة بعملها، قائلا إن تقليص تلك الفجوة يتطلب من أرباب العمل مراجعة "دورة حياة التوظيف والتشغيل" بأكملها.
ويضيف أن ذلك يعني "دراسة وفحص الممارسات المتعلقة بتوظيف عمال جدد والخاصة بالإبقاء على العمال الموجودين بالفعل في داخل المؤسسة، وكذلك تلك السياسات المرتبطة بالإدارة والتدريب والتطوير ومنح مكافآت وتقدير جهود الموظفين، جنبا إلى جنب مع مراجعة تصميم هيكل المؤسسة وطبيعة العمل فيها والوظائف أيضا".
ويقول كوتون إن "تحقيق تقدم طفيف في كل من هذه المجالات على حدة، قد يؤدي إلى فارق كبير بشكل عام".
وفي وقت لاحق، رضخت تلك الشركات للضغوط الحكومية، وأعادت تصحيح أرقامها لكي تتضمن الرواتب التي يحصل عليها هؤلاء الأشخاص. رغم ذلك، فلا يزال لدى البعض منها مستشارون يتقاضون أجورا مرتفعة، دون أن يُدرجوا على كشوف رواتب الموظفين، لأن إدارات تلك الشركات تعتبر أن أولئك الأشخاص متعاقدون أو مستشارون من الخارج.
اللافت أن تضمين هذه الأرقام غير كاف، إذ أن الآليات الخاصة بالتحقق من دقة ما تنشره تلك الشركات لا تزال محدودة للغاية.
وفي العام الماضي، أجرت صحيفة "فاينانشال تايمز" تحقيقا استقصائيا أظهر أن واحدا من كل 20 تقريرا متعلقا بالفجوة في الأجور بين الجنسين تضمن بيانات غير محتملة الحدوث من الوجهة الإحصائية، وهو ما يرجح كونه غير دقيق.
فعلى سبيل المثال، ادعت 16 شركة أنها تدفع الراتب نفسه في المتوسط لموظفيها وموظفاتها دون تفرقة، وهو ما يعني انعدام الفجوة في الأجور بين الجنسين. غير أن الكثير من هذه الشركات - وبينها أسماء كبرى - أعادت تصحيح بياناتها وأرقامها في هذا الشأن.
وفي العام الجاري، أفصحت مئات الشركات عن بيانات لا تبدو محتملة بدورها من الناحية الإحصائية.
ورغم أنه يوجد في بريطانيا مفوضية حكومية تتولى المسؤولية عن تطبيق القانون الخاص بالكشف عن حجم الفجوة بين الرجال والنساء في الرواتب، فإن هيلين ريردون بوند تقول إن الصلاحيات الممنوحة لهذه المفوضية "عفا عليها الزمن إلى حد بعيد" ما يجعلها غير ملائمة للوفاء بمتطلبات عملية تحديد هذه الفجوة ونشر تفاصيلها.
وربما يجدر بنا الآن الاطلاع على رأي تشارلز كوتون، الخبير الاستشاري البارز في شؤون الأجور والمكافآت في معهد تشارتارد للأفراد والتنمية في المملكة المتحدة، وهو المعهد الذي يوفر للحكومة البريطانية أدلة ومعطيات تخص قضايا قانونية ترتبط بالأجور ومسألة إحالة العاملين إلى التقاعد، وملف رواتب التقاعد كذلك.
ويقول كوتون إنه يشعر بالقلق حيال مدى توخي الشركات الدقة حيال ملف التفاوت في الرواتب بين العاملين والعاملات فيها، رغم أنه يقر بأنه لم يطلع حتى الآن على أي أدلة تثبت تورط هذه المؤسسات في عملية التلاعب ببياناتها.
ويشير كوتون إلى أنه من السهل أن تتسلل الأخطاء إلى عملية إعداد التقارير الخاصة بهذا الأمر، خاصة إذا لم يكن هناك تنسيق بين الأقسام ذات الصلة بذلك الملف.
لكن البعض يتهمون الشركات والمؤسسات بأنها تكتفي بإبداء الاحترام الظاهري للقانون المطبق في هذا الشأن، دون القيام بأي إجراءات عملية للالتزام به.
شهدت السنوات الأخيرة تحول عشرات من المستثمرين الكبار في العالم، خاصة من العاملين في مجال إدارة الأصول في فرنسا، للتركيز على الاستثمار في صناديق تتوخى المسؤولية الاجتماعية، وتتجنب ضخ الأموال في الشركات التي تبيع المشروبات الكحولية والتبغ، أو تروج للمقامرة والحروب، أو تسهم في إحداث أضرار بيئية.
ومن الممكن أن يصبح ضمان وجود تنوع في قوة العمل في الشركات والمؤسسات هو الهدف التالي اللازم تحقيقه، إذا ما كنا نتحدث عن المعايير الأخلاقية التي يتم من خلالها تقييم الاستثمارات التي تقوم بها رؤوس الأموال الكبرى.
وفي فبراير/شباط الماضي، قالت مجموعة "هيرميس لإدارة صناديق الاستثمار"، وهي شركة استثمارية بارزة تتخذ من المملكة المتحدة مقرا لها، إنها ستتخذ موقفا أكثر صرامة من الشركات والمؤسسات التي لا تضمن التمثيل المتكافئ للرجال والنساء في مجالس إداراتها أو لجانها التنفيذية، وهو أمر قد تحذو شركات أخرى حذوه.
ويشير تشارلز كوتون إلى أن دولا مثل فرنسا وألمانيا تشكل نموذجا إيجابيا، على صعيد تحسين مستوى الشفافية ومن ثم إحداث التغييرات المنشودة على صعيد تقليص التفاوت بين الجنسين في الرواتب.
ويضيف: "بوسع أي موظف في ألمانيا أن يطلب مقارنة راتبه برواتب ستة من الموظفين المناظرين له ولكن من الجنس الآخر. وبمقدور الأفراد اللجوء إلى المحاكم إذا شعروا بأنهم يتعرضون للتمييز. ورغم أن ذلك لم يُستغل حتى الآن سوى من جانب عدد محدود من الأشخاص، فمن المرجح أن يتغير هذا الوضع مع تزايد عدد من يعرفون بتوافر مثل هذه الفرصة لهم".
أما في فرنسا، فيتم تقييم الشركات التي يصل عدد موظفيها إلى ألف شخص أو أكثر، على مقياس مؤلف من مئة درجة، بحسب مدى توافقها مع معايير من بينها تقليص الفجوة في الأجور بين الجنسين وآليات الترقي المتبعة فيها.
وتُمنح الشركات التي يقل معدلها في هذا الشأن عن 75 في المئة ثلاث سنوات لتحسين تصنيفها، وما لم تنجح في ذلك تفرض عليها غرامة تصل إلى واحد في المئة من قيمة الرواتب التي تمنحها.
كما أعلنت فرنسا أنها ستستحدث برنامج كمبيوتر خاصا لمراقبة كشوف الرواتب لدى الشركات المختلفة، للتعرف على مدى التفاوت في الأجور بين الجنسين.
وبحسب هيلين ريردون بوند المستشارة السابقة لدى الحكومة البريطانية، تتبوأ الدول الإسكندنافية مكانة متميزة على صعيد تقليص هذه الفجوة، من خلال ما توفره من رعاية شاملة للأطفال، وما هو موجود فيها من فرص للآباء والأمهات لنيل إجازة للعناية بالمواليد الجدد.
وتقول بوند إن مثل هذه الأمور تُحدث فارقا لأن الفجوة في الرواتب بين الجنسين غالبا ما تكون أكثر وضوحا وبروزا عندما تحصل الموظفات على عطلات ينقطعن فيها عن العمل من أجل تكوين أسرة.
وبالعودة إلى المملكة المتحدة، سنجد كوتون يعرب عن رغبته في وضع خطة متماسكة تستهدف تحقيق تقدم على صعيد تقليص أي تفاوت في الأجور بين الجنسين، ما يفسح المجال نحو مساءلة الشركات عن أدائها في هذا المضمار على نحو أكبر.
وينتقد كوتون مواصلة نحو ثلث الشركات تقديم البيانات الخاصة بذلك التفاوت، بدون تفسير للأرقام التي تتضمنها، وبمعزل عن البيانات الأخرى المتعلقة بعملها، قائلا إن تقليص تلك الفجوة يتطلب من أرباب العمل مراجعة "دورة حياة التوظيف والتشغيل" بأكملها.
ويضيف أن ذلك يعني "دراسة وفحص الممارسات المتعلقة بتوظيف عمال جدد والخاصة بالإبقاء على العمال الموجودين بالفعل في داخل المؤسسة، وكذلك تلك السياسات المرتبطة بالإدارة والتدريب والتطوير ومنح مكافآت وتقدير جهود الموظفين، جنبا إلى جنب مع مراجعة تصميم هيكل المؤسسة وطبيعة العمل فيها والوظائف أيضا".
ويقول كوتون إن "تحقيق تقدم طفيف في كل من هذه المجالات على حدة، قد يؤدي إلى فارق كبير بشكل عام".
Friday, March 29, 2019
ملياردير روسي يسترد يختا فارها خلال معركة قضائية على تسوية طلاق
استعاد رجل أعمال روسي يخته الذي تبلغ قيمته 436 مليون دولار أمريكي، في أحدث تطور بقضية تسوية طلاق مثيرة.
وأعلن فرهاد أحمدوف أن محكمة استئناف في دبي أبطلت قرارًا سابقًا بمصادرة يخته.وكانت محكمة بريطانية أمرت في وقت سابق أحمدوف، بدفع 600 مليون دولار لزوجته في تسوية لقضية الطلاق.
لكن محكمة إماراتية قضت بإلغاء قرار مصادرة اليخت نظراً لصعوبة تنفيذه في دبي.
وصرح متحدث باسم الملياردير الروسي لصحيفة "غلف نيوز الإماراتية" أن " أحمدوف يشعر بالسرور، لكنه لم يفاجأ بقرار المحكمة اليوم لصالح شركته العائلية".
وأضاف أن محاولات زوجة أحمدوف السابقة للاستيلاء على أصوله كانت "مضللة مثل قرار محكمة العدل البريطانية".
ويُعتقد أن التسوية التي كانت في عام 2017، واحدة من أكبر تسويات قضايا الطلاق في تاريخ المملكة المتحدة.
ويصر أحمدوف على أنه طلق زوجته السابقة، تاتيانا أحمدوفا، في روسيا عام 2000.
ومع ذلك، قال القاضي هادون كيف إنه لم يعثر على أي دليل على ذلك، وخلص إلى أن وثائق الطلاق الأصلية كانت "مزورة".
وأمر القاضي بتجميد أصول أحمدوف في جميع أنحاء العالم لضمان حصول زوجته السابقة على أموالها المستحقة بموجب قرار المحكمة.
لكن محكمة الاستئناف في دبي قضت أنه من الخطأ حجز اليخت الضخم "لونا"، الذي كان مملوكاً في السابق للملياردير الروسي رومان أبراموفيتش.
كما أمرت تاتيانا أحمدوفا بدفع جميع التكاليف القانونية لزوجها السابق.
ويحمل كل من أحمدوف وزوجته السابقة الجنسية الروسية، إلا أن لديها إقامة دائمة في المملكة المتحدة.
أفرجت السلطات السعودية مؤقتا عن ثلاث
ناشطات من بين 11 ناشطة محتجزات منذ أكثر من تسعة أشهر، وكانت تقارير
أشارت إلى أن بعضهن أبلغ المحكمة بأنهن تعرضن للتعذيب والتحرش الجنسي خلال
استجوابهن.
وأصدرت المحكمة الجزائية بالرياض أمرا بالإفراج المؤقت عن الناشطات: رقية المحارب وعزيزة اليوسف وإيمان النفجان، بعد تقدمهن بطلب
الإفراج المؤقت للمحكمة، بحسب وكالة الأنباء السعودية. وأشارت المحكمة فى قرارها إلى أنها ستواصل النظر في قضاياهن مع "حضورهن لجلسات المحاكمة مطلقات السراح لحين صدور الأحكام النهائية والمكتسبة للقطعية فيما نسب إليهن".
وكانت تقارير صحفية أفادت بأن الناشطات قدمن في ثاني جلسات محاكمتهن، التي منع من حضورها مراسلون أجانب ودبلوماسيون، ردودهن على اتهامات تقول جماعات حقوقية إن من بينها التواصل مع وسائل إعلام وهيئات حقوقية دولية.
ونقلت وكالة فرانس برس للأنباء عن شاهدي عيان إشارتهما إلى بكاء بعض الناشطات خلال المحاكمة لدى اتهامهن محققين بصعقهن بالكهرباء وجلدهن والتحرش جسديا بهن أثناء الاعتقال.
وقد تجمع أعضاء من عائلات الناشطات أمام هيئة المحكمة المؤلفة من ثلاثة قضاة في محكمة الرياض الجنائية.
ونقلت الوكالة ذاتها عن قريب لإحدى الناشطات قوله: إنها حاولت الانتحار بعدما تعرضت له من سوء المعاملة.
وتقول وكالة رويترز إن جماعات حقوقية أشارت إلى أن ثلاث من الناشطات على الأقل قد خضعن للحبس الانفرادي لشهور، وتعرضن للتعذيب الذي شمل الصعق الكهربائي والجلد والتحرش الجنسي.
وتواجه الحكومة السعودية رقابة دولية مكثفة بسبب سجلها الخاص بحقوق الإنسان، وتنكر الحكومة تعرض الناشطات للتعذيب أو التحرش.
وقال النائب العام السعودي إن مكتبه حقق في الادعاءات وخلص إلى أنها كاذبة.
وتعرضت النسوة الإحدى عشرة، وبينهن الناشطة البارزة لجين الهذلول والمدونة إيمان النفجان وأستاذة الجامعة هتون الفاسي والأكاديمية عزيزة اليوسف -التي هي في عقدها السادس-، للاعتقال الصيف الماضي في حملة موسعة ضد النشطاء قبل أسابيع من الرفع التاريخي لحظر دام عقودا على قيادة المرأة للسيارة في المملكة.
ورأى نشطاء ودبلوماسيون آنذاك أن توقيف الناشطات جاء بمثابة رسالة لنظرائهن بعدم الدفع بمطالب خارج أجندة الحكومة، لكن ولي العهد نفى ذلك، متهما الناشطات بالتعاون مع الاستخبارات القطرية والإيرانية.
وكانت الناشطات يطالبن منذ فترة طويلة بحق القيادة وإلغاء نظام الوصاية المقيِّد الذي يرينّ أنه يخوّل الأقارب الذكور سلطة تعسفية على النساء.
وجلبت محاكمة النسوة السعوديات نقدا مكثفا على المملكة بشأن حقوق الإنسان، في أعقاب موجة من الغضب العالمي جراء مقتل الصحفي جمال خاشقجي على أيدي وكلاء سعوديين في أكتوبر/تشرين الأول الماضي.
وادعى شقيق وشقيقة لجين، المقيمان بالخارج، أن سعود القحطاني - الذي أقيل من منصبه كأحد كبار مستشاري ولي العهد محمد بن سلمان بعد مقتل خاشقجي- أشرف على عمليات التعذيب.
وقال وليد الهذلول، شقيق لجين، لشبكة سي إن إن: "المستشار البارز لولي العهد كان يهدد باغتصاب أختي، وقتلها، وتقطيع جسدها إلى أشلاء. هذا هو الشخص الذي كان ينبغي أن يمثل اليوم أمام المحكمة، وليس أختي".
ولم يظهر القحطاني للعلن منذ إعلان إقالته.
وقالت جماعة القسط الحقوقية السعودية ومقرها لندن، إن الحالة الصحية لـ نوف عبد العزيز، إحدى المعتقلات شهدت تدهورا مؤخرا، دون توضيح السبب. وأفاد مصدر بأن نوف لم تظهر في ساحة المحكمة.
ونقلت فرانس برس عن أقارب المعتقلات، أن عددا منهن تقدم بالتماس للحصول على الإفراج بكفالة، وأضافوا بأن المحاكمة ستُستأنف في الثالث من أبريل/نيسان.
وإبان توقيف الناشطات، اتهمهن مسؤولون سعوديون بالتواصل مع وكالات استخبارات أجنبية، بينما وصفتهن وسائل الإعلام المدعومة حكوميا بالخائنات و"عميلات السفارات".
وكان مكتب النائب العام قال في مايو/آيار الماضي، إن عددا من النساء والرجال أوقفوا للاشتباه في الإضرار بمصالح السعودية وتقديم الدعم لعناصر عدائية في الخارج.
ولم يرِد مع ذلك في لوائح الاتهام ذِكْر لأي اتصال مع وكالات استخبارات أجنبية، حسبما قال نشطاء اطلعوا على الوثائق.
وتندرج بعض الاتهامات الموجهة للنسوة تحت طائلة قانون الجرائم المعلوماتية في المملكة، والذي ينص على عقوبة بالسجن تصل إلى خمس سنوات.
وقال وليد الهذلول إن شقيقته طلبت من المحكمة إمهالها شهرا للرد على الاتهامات، قائلة إنها لم تُعط الوقت الكافي للاستعداد.
وأضاف وليد بأن أسرته مُنعت من اصطحاب وثائق قانونية مكتوبة إلى داخل زنزانة شقيقته.
ولم يتضح كيف استجابت المحكمة لطلب لجين.
وكان متوقعا في البداية أن تمْثُل النسوة المعتقلات أمام محكمة أنشئت خصيصا للفصل في قضايا تتعلق بالإرهاب.
لكن القضية أحيلت إلى المحكمة الجنائية في آخر لحظة، دون أي تفسير، بعد شهور من انتقادات غربية.
وقد فتح ذلك الباب أمام تكهنات بأن تفضي المحاكمة إلى إخلاء سبيل النسوة بعد أن أشعلت الحملة ضد الناشطات انتقادات دولية ضد ولي العهد والحاكم الفعلي للمملكة.
وبحسب أقاربهن، فقد حُملت مؤخرا بعض النسوة المعتقلات، وبينهن لجين، على توقيع خطابات في محبسهن لطلب عفو ملكي من الملك سلمان بن عبد العزيز.
ومارست دول غربية، بينها بريطانيا والولايات المتحدة وكافة دول الاتحاد الأوروبي وكندا وأستراليا، ضغوطا متزايدة على المملكة السعودية للإفراج عن الناشطات.
وأثار وزير الخارجية البريطاني جيريمي هانت، ونظيره الأمريكي مايك بومبيو، القضية أثناء زيارات قاما بها مؤخرا إلى المملكة.
وكتب تسعة أعضاء بارزين بمجلس الشيوخ الأمريكي خطابا إلى الملك سلمان يناشدونه بالإفراج الفوري عن السجناء المحتجزين على خلفية "اتهامات مشكوك فيها تتعلق بنشاطهم"، مشيرين إلى العديد من النسوة اللائي يخضعن للمحاكمة.
Thursday, February 21, 2019
أشجار يابانية عتيقة "تتنبأ" بالمستقبل
ويقول تاكاتسكي إن معرفة الظروف المناخية التي سادت في الماضي، تجعل
تصورنا عن التاريخ أكثر ثراءً، بما قد يفيد كذلك في توقع كيف يمكن أن يكون
رد فعل الأسواق على أي شحٍ في المواد يحدث في المستقبل جراء التغير
المناخي.
ونعود إلى ناكتسكا الذي يرى أن أحد أبرز الدروس المستفادة من الاستخلاصات التي توصل إليها وفريقه، يتمثل في أن الناس يعتادون سريعاً الظروف المواتية شريطة أن تستمر لفترةٍ كافيةٍ، أي لما هو أكثر من 10 أو 20 عاماً مثلاً، وليس لعامٍ أو عامين.
ففي هذه الحالة "يزيد الناس نسلهم، ويغيرون أنماط حياتهم ومستويات معيشتهم، ويعتادون تناول الأرز يومياً". وشير إلى أنه عندما تنتهي هذه الأوقات الجيدة فجأة، لا يستطيع المجتمع التكيف على ذلك بسرعةٍ كافية، ويشيع الخراب غالباً في صورة مجاعات.
كما يصبح المجتمع بيئةً خصبةً بشكل أكبر لأن يشهد نشوب نزاعات، خاصة لو لم تكن التأثيرات البيئية موزعةً بشكلٍ متساوٍ على مختلف أنحاء البلاد، ما يمزق السكان بين من يملكون ومن لا يملكون. ومن بين الأمثلة على ذلك، تصاعد معدلات الجريمة والاقتتال الداخلي في بعض الأقاليم جراء حدوث فيضاناتٍ عارمةٍ فيها، أواخر القرن الثالث عشر وخلال القرن التالي لذلك.
ويقر ناكتسكا بأن وضع العالم الآن اختلف، إذ بات منفتحاً على بعضه بعضاً على نحوٍ أكبر، وأصبح كذلك أكثر تطوراً من الوجهة التكنولوجية مما كان عليه قبل قرون. فـ "الآن، يمكننا إذا انخفضت درجة الحرارة، أن نستورد الأرز من دولٍ أجنبية، ما يقينا خطر التضور جوعاً".
لكن ناكتسكا يقول إننا نبقى في كل الأحوال بشراً تكبلهم حقيقة أن التغيير يُحْدِثُ توتراتٍ وضغوطاً، تقود بدورها إلى اضطراباتٍ اجتماعية. ويمكن القول إنه من المرجح أن تتفاقم خلال السنوات المقبلة مشاعر الاستياء والخوف المتراكمة على خلفية التغيرات الثقافية والمناخية والاقتصادية والديموغرافية، وهو ما يزيد من جاذبية الحكم السلطوي والشعبوي في أعين الناس.
من ناحيةٍ أخرى، هناك أمثلةٌ معروفةٌ بالفعل - على التأثيرات التي تُخلّفها التغيرات المناخية التي تحدث كل بضعة عقود في تاريخ الأمم - تندرج خارج نطاق الدراسة التي أجراها ناكتسكا ورفاقه. من بينها ما كشفه باحثون في الولايات المتحدة ومنغوليا مؤخراً من أن صعود جنكيز خان للسلطة وغزوه للصين تزامنا مع فترةٍ هطلت فيها الأمطار بغزارةٍ استثنائيةٍ لمدة 15 عاماً، وهو ما وفر له فائض الثروة الحيوانية، الذي احتاجه لدعم جيشٍ شكله في تلك الفترة.
ويأمل ناكتسكا وزملاؤه في أن تلهم دراستهم باحثين آخرين في شتى أنحاء العالم، لإجراء دراساتٍ مماثلةٍ لتحديد ما إذا كانت التغيرات المناخية، قد أدت إلى إغراق المجتمعات الغابرة في الاضطرابات، أم أن هذه التجمعات البشرية قد نجحت في مواجهة تلك التقلبات بنجاح.
وفي ظل ما هو متوقعٌ من أن يشهد مناخ الأرض تغيراتٍ على مستوياتٍ غير مسبوقة خلال العقود المقبلة، ربما يحمل لنا الماضي في طياته مفاتيح من شأنها تعريفنا بطبيعة ما ينبغي أن نُعِدَ أنفسنا لمواجهته.
وفي نهاية المطاف، يقول ناكتسكا: "يتضمن التاريخ الإنساني الكثير من الأمثلة، التي يمكن أن نستخلص منها دروساً مشتركةً ذات صلةٍ بالتغير البيئي العالمي المعاصر. والدرس الماثل أمامنا الآن هو أنه يتوجب علينا التحضير لتقليص أي أضرارٍ أو خسائر".
ونعود إلى ناكتسكا الذي يرى أن أحد أبرز الدروس المستفادة من الاستخلاصات التي توصل إليها وفريقه، يتمثل في أن الناس يعتادون سريعاً الظروف المواتية شريطة أن تستمر لفترةٍ كافيةٍ، أي لما هو أكثر من 10 أو 20 عاماً مثلاً، وليس لعامٍ أو عامين.
ففي هذه الحالة "يزيد الناس نسلهم، ويغيرون أنماط حياتهم ومستويات معيشتهم، ويعتادون تناول الأرز يومياً". وشير إلى أنه عندما تنتهي هذه الأوقات الجيدة فجأة، لا يستطيع المجتمع التكيف على ذلك بسرعةٍ كافية، ويشيع الخراب غالباً في صورة مجاعات.
كما يصبح المجتمع بيئةً خصبةً بشكل أكبر لأن يشهد نشوب نزاعات، خاصة لو لم تكن التأثيرات البيئية موزعةً بشكلٍ متساوٍ على مختلف أنحاء البلاد، ما يمزق السكان بين من يملكون ومن لا يملكون. ومن بين الأمثلة على ذلك، تصاعد معدلات الجريمة والاقتتال الداخلي في بعض الأقاليم جراء حدوث فيضاناتٍ عارمةٍ فيها، أواخر القرن الثالث عشر وخلال القرن التالي لذلك.
ويقر ناكتسكا بأن وضع العالم الآن اختلف، إذ بات منفتحاً على بعضه بعضاً على نحوٍ أكبر، وأصبح كذلك أكثر تطوراً من الوجهة التكنولوجية مما كان عليه قبل قرون. فـ "الآن، يمكننا إذا انخفضت درجة الحرارة، أن نستورد الأرز من دولٍ أجنبية، ما يقينا خطر التضور جوعاً".
لكن ناكتسكا يقول إننا نبقى في كل الأحوال بشراً تكبلهم حقيقة أن التغيير يُحْدِثُ توتراتٍ وضغوطاً، تقود بدورها إلى اضطراباتٍ اجتماعية. ويمكن القول إنه من المرجح أن تتفاقم خلال السنوات المقبلة مشاعر الاستياء والخوف المتراكمة على خلفية التغيرات الثقافية والمناخية والاقتصادية والديموغرافية، وهو ما يزيد من جاذبية الحكم السلطوي والشعبوي في أعين الناس.
من ناحيةٍ أخرى، هناك أمثلةٌ معروفةٌ بالفعل - على التأثيرات التي تُخلّفها التغيرات المناخية التي تحدث كل بضعة عقود في تاريخ الأمم - تندرج خارج نطاق الدراسة التي أجراها ناكتسكا ورفاقه. من بينها ما كشفه باحثون في الولايات المتحدة ومنغوليا مؤخراً من أن صعود جنكيز خان للسلطة وغزوه للصين تزامنا مع فترةٍ هطلت فيها الأمطار بغزارةٍ استثنائيةٍ لمدة 15 عاماً، وهو ما وفر له فائض الثروة الحيوانية، الذي احتاجه لدعم جيشٍ شكله في تلك الفترة.
ويأمل ناكتسكا وزملاؤه في أن تلهم دراستهم باحثين آخرين في شتى أنحاء العالم، لإجراء دراساتٍ مماثلةٍ لتحديد ما إذا كانت التغيرات المناخية، قد أدت إلى إغراق المجتمعات الغابرة في الاضطرابات، أم أن هذه التجمعات البشرية قد نجحت في مواجهة تلك التقلبات بنجاح.
وفي ظل ما هو متوقعٌ من أن يشهد مناخ الأرض تغيراتٍ على مستوياتٍ غير مسبوقة خلال العقود المقبلة، ربما يحمل لنا الماضي في طياته مفاتيح من شأنها تعريفنا بطبيعة ما ينبغي أن نُعِدَ أنفسنا لمواجهته.
وفي نهاية المطاف، يقول ناكتسكا: "يتضمن التاريخ الإنساني الكثير من الأمثلة، التي يمكن أن نستخلص منها دروساً مشتركةً ذات صلةٍ بالتغير البيئي العالمي المعاصر. والدرس الماثل أمامنا الآن هو أنه يتوجب علينا التحضير لتقليص أي أضرارٍ أو خسائر".
Thursday, January 17, 2019
حدود قطر فقط تغلقها السعودية في يونيو/حزيران 2017
وصف أسطورة كرة القدم البرازيلية، زيكو، مباراة نهائي كأس أمم آسيا عام
2004 بين اليابان والصين التي أقيمت في بكين، قائلا: "كانت أجواؤها مشحونة
بالتوتر على نحو لم أرَ مثيلا له في حياتي كمدرب فني."، وكان زيكو حينها مدربا لليابان، واعتاد على أجواء المنافسة الملتهبة في كرة القدم بأمريكا
الجنوبية.
في الطريق إلى المباراة، انتقدت الصين أفعالا يابانية وصفتها بالوحشية في الشرق الأقصى في بواكير القرن العشرين وإبان الحرب العالمية الثانية.
وارتفعت حدة التوترات إلى حدٍّ دفع السلطات اليابانية إلى توجيه النصح للمشجعين بعدم ارتداء أي رموز وطنية لدى الذهاب إلى الملاعب.
وزاد التوتر أكثر بعد تسجيل اللاعب الياباني كوجي ناكاتا هدفا باليد في مرمى الصين في الدقيقة الـ 68، وبعد ما كان التعادل قائما انتهت المباراة بنتيجة 3-1 لصالح اليابان.
وكان ثمة أعمال شغب مشتعلة خارج الملعب واحتاج مشجعو ولاعبو اليابان حراسة شُرطية وسط مشاهد ظهر فيها مشجعون صينيون يحرقون أعلاما يابانية.
وبالنظر إلى أي قائمة تضم فرق كرة قدم متنافسة دوليا وسط أجواء سياسية مشحونة، ستبدو مباراة السعودية ضد إيران في مرتبة عالية من تلك القائمة.
وثمة تنافس رياضي تاريخي، فكلا الفريقين فاز بالكأس الآسيوية ثلاث مرات، آخرها السعودية عام 1996، لكن أسباب العداوة بين البلدين تتعلق أكثر بمسائل جيوسياسية.
وتشمل التوترات هذه الأيام الحرب بالوكالة التي تخوضها المملكة العربية ضد إيران على الأراضي السورية، حيث تدعم حكومة طهران نظيرتها المتمثلة في حكومة بشار الآسد.
أما السعودية ذات الأغلبية السنية، فإن حكومتها تدعم جماعات مسلحة في جهودها للإطاحة بنظام الأسد في الحرب الأهلية السورية، في إطار خطة لاحتواء نفوذ إيران في الشرق الأوسط.
وتأتي حقيقة أن البلدين منخرطان في حرب أخرى بالوكالة في اليمن لتزيد الأمور تعقيدا.
وقد امتدت شواهد العداوة بالفعل إلى المستطيل الأخضر، ففي عام 2016، أعلنت السعودية أنها لن تلعب مباريات في طهران إثر هجمات تعرضت لها بعثتها الدبلوماسية في طهران -في إطار مظاهرات ضد إعدام السعودية رجل الدين البارز نمر النمر.
لابد أن ينعكس السلام الهش بين الكوريتين على أرض الملعب، هل تتفق مع هذا؟ ليس إلى حد بعيد، كما يبدو.
ليس غريبا على الكوريين أن يشجع كل بلد فريق جارته. وقد حظي لاعبون من أمثال الكوري الشمالي يونغ تاي-سي بشعبية كبرى في كوريا الجنوبية.
واحتفلت الصحافة الكورية الشمالية بنجاح استضافة كوريا الجنوبية مع اليابان لبطولة كأس العالم 2002 وبوصول فريقها لنصف النهائي، كأول فريق آسيوي يحقق ذلك.
وفي ظل شعور مشترك بالوحدة الكورية، لا تزال الغالبية على الجانبين الشمالي والجنوبي لشبه الجزيرة تحبّذ عودة الوحدة، وإنْ كان الدعم الشعبي لهذا الاتحاد قد تراجع في الشطر الجنوبي من 90 في المئة تقريبا عام 1969 إلى 58 في المئة العام الماضي، طبقا لاستطلاعات رأي أجراها المعهد الكوري للوحدة الوطنية.
لكن بعض المشاحنات طفت على السطح؛ ففي عام 2008 تغيّر مكان إقامة المباراة المؤهلة لكأس العالم بين الكوريتين من بيونغيانغ إلى شانغهاي بعد أن رفض النظام الكوري الشمالي السماح بعزف النشيد الوطني أو رفع العلم الكوري الجنوبي في ملعب كيم إل سونغ.
وبعد ذلك بعام، وفي سول، عزت السلطات الكورية الشمالية الهزيمة 1-0 إلى خطة مزعومة لتسميم لاعبيها.
جدير بالذكر أن فريقي الكوريتين مشاركان في بطولة كأس آسيا ليس بدعًا "إعادة تحديد مكان" الفرق الدولية لكرة القدم. وقد نُقل فريق استراليا إلى الاتحاد الآسيوي لكرة القدم عام 2006 سعيًا لمباريات أكثر تنافسية من تلك التي تشهدها مباريات كأس أوقيانوسيا، وكان منتخب استراليا قد هزم فريق منتخب جزر الساموا الأمريكية (31-0)، على سبيل المثال لا أكثر.
وستشارك دولة قطر التي ستستضيف كأس العالم 2022 في بطولة كوبا أمريكا (بطولة أمريكا الجنوبية الدولية) في إطار برنامج تستهدف من خلاله أن يكستب فريقها الوطني مزيدًا من الخبرة.
أما بالنسبة لوضع إسرائيل في كأس الأمم الأوروبية، فإن الأمر لا يزال أكثر تعقيدا منذ عام 1994.
فعلى الرغم من انضمامها أصلا إلى كأس الأمم الأوروبية، فقد واجهت الدولة اليهودية مقاطعة من بلدان مسلمة من أول يوم.
وفي عام 1958 فازت إسرائيل في المباريات المؤهلة لكأس العالم عن المنطقة دون أن تلعب مباراة واحدة - ما أجبر الفيفا على تنظيم مباراة فاصلة بين فريقي ويلز وإسرائيل خسرها الأخير.
وفي عام 1964، استضافت إسرائيل بطولة كأس آسيا وفازت بها، لكن 11 فريقا انسحبوا من البطولة.
وقد تأهلت إسرائيل كبلد آسيوي لنهائيات كأس العالم عام 1970، ولم تكد تنافس في دورة الألعاب الآسيوية عام 1974 بإيران حتى احتدت التوترات في الشرق الأوسط، مما قاد إلى استبعادها من بطولة كأس آسيا 1974.
وفي الفترة الممتدة من 1982 إلى 1994، شاركت إسرائيل في بطولات دولية بأوروبا وأوقيانوسيا قبل أن تمسي رسميا عضوا بالاتحاد الأوروبي لكرة القدم - وتشارك أندية إسرائيل في مسابقات دوري أبطال أوروبا.
على الرغم من استضافة كأس العالم 2002 سويا، إلا أن العلاقة بين اليابان وكوريا الجنوبية معقدة نوعا ما.
وقد ترك الحكم الياباني لشبه الجزيرة الكورية زهاء 35 عاما (1910-1945) كثيرا من الضغينة، ولا تزال بين الدولتين قضايا مثيرة للجدل كمسائل تتعلق بالعمالة القسرية لمئات الآلاف من الرجال والنساء الكوريين أثناء فترة الاحتلال.
وفي عام 1954، استبقت حكومة كوريا الجنوبية مباراة مؤهلة لكأس العالم بقرار يحظر دخول اليابانيين إلى بلادها، ونُقل عن الرئيس سيغمان ري حينها القول: "لا يزال الوقت مبكرا جدا على ذلك".
وفي النهاية، تراجعت سول عن التمسك بحق اللعب أمام مشجعين كوريين، وأقيمت المبارتان على أرض يابانية.
وكسب الكوريون المباراة 7-3 ، ومن غير الواضح كيف أثمرت تهديدات الرئيس ري للاعبين "بعدم التجرؤ على الرجوع حال الخسارة".
وفي عام 2012 عاود الكوريون الفوز على جيرانهم، وهذه المرة في مباراة تحديد الفائز بالميدالية البرونزية في أوليمبياد لندن.
وعرض لاعب خط الوسط، بارك يونغ-وو، لافتة مكتوب عليها "دوكدو إقليمنا"، في إشارة إلى جزيرة صغيرة متنازع عليها تطلق عليها اليابان اسم "تاكيشيما" - مما حدا باللجنة الأوليمبية الدولية إلى سحب الميدالية منه.
وبعد مرور عام، حظيت لافتة رفعها مشجعون محليون تقول: "لا مستقبل لجيل نسي التاريخ" باهتمام واسع غطى على فوز اليابان 2-1 بكأس شرق آسيا.
وقد سلكت كوريا الشمالية، على نحو غريب، مسلكا مختلفا؛ فقد مثّل البلاد عددٌ من اللاعبين المولودين في اليابان، ومن بينهم (يونغ تاي-سي)، الذي قاد كوريا الشمالية إلى كأس العالم 2010 - في المرة الثانية التي تشارك فيها البلاد بالبطولة.
ثمة مشكلة أخرى تضمها السعودية بين طياتها: ففي 17 يناير/كانون الثاني الجاري تواجه السعودية قطر فيما يمكن اعتبارها مباراة حاسمة في مجموعتهما.
وهذه هي المرة الأولى التي يلتقي فيها الفريقان منذ الأزمة الدبلوماسية التي أدت إلى قطع السعودية ودول أخرى علاقاتها مع قطر منذ أكثر من عام ونصف.
وفي محاولة لتخفيف حدة التوتر، قال المنسق الإعلامي للمنتخب القطري، علي الصلات، "في النهاية، للرياضة رسالة سلام. وعليه، فهذا ما نسعى لتقديمه، ونحن نأمل أن نمثل بلدنا على نحو جيد أثناء المنافسة."
إلا أن جدلا ثار عندما مُنع نائب رئيس الاتحاد القطري وعضو اللجنة التنفيذية بالاتحاد الآسيوي لكرة القدم، سعود المهندي، من دخول الإمارات العربية المتحدة
في الطريق إلى المباراة، انتقدت الصين أفعالا يابانية وصفتها بالوحشية في الشرق الأقصى في بواكير القرن العشرين وإبان الحرب العالمية الثانية.
وارتفعت حدة التوترات إلى حدٍّ دفع السلطات اليابانية إلى توجيه النصح للمشجعين بعدم ارتداء أي رموز وطنية لدى الذهاب إلى الملاعب.
وزاد التوتر أكثر بعد تسجيل اللاعب الياباني كوجي ناكاتا هدفا باليد في مرمى الصين في الدقيقة الـ 68، وبعد ما كان التعادل قائما انتهت المباراة بنتيجة 3-1 لصالح اليابان.
وكان ثمة أعمال شغب مشتعلة خارج الملعب واحتاج مشجعو ولاعبو اليابان حراسة شُرطية وسط مشاهد ظهر فيها مشجعون صينيون يحرقون أعلاما يابانية.
وبالنظر إلى أي قائمة تضم فرق كرة قدم متنافسة دوليا وسط أجواء سياسية مشحونة، ستبدو مباراة السعودية ضد إيران في مرتبة عالية من تلك القائمة.
وثمة تنافس رياضي تاريخي، فكلا الفريقين فاز بالكأس الآسيوية ثلاث مرات، آخرها السعودية عام 1996، لكن أسباب العداوة بين البلدين تتعلق أكثر بمسائل جيوسياسية.
وتشمل التوترات هذه الأيام الحرب بالوكالة التي تخوضها المملكة العربية ضد إيران على الأراضي السورية، حيث تدعم حكومة طهران نظيرتها المتمثلة في حكومة بشار الآسد.
أما السعودية ذات الأغلبية السنية، فإن حكومتها تدعم جماعات مسلحة في جهودها للإطاحة بنظام الأسد في الحرب الأهلية السورية، في إطار خطة لاحتواء نفوذ إيران في الشرق الأوسط.
وتأتي حقيقة أن البلدين منخرطان في حرب أخرى بالوكالة في اليمن لتزيد الأمور تعقيدا.
وقد امتدت شواهد العداوة بالفعل إلى المستطيل الأخضر، ففي عام 2016، أعلنت السعودية أنها لن تلعب مباريات في طهران إثر هجمات تعرضت لها بعثتها الدبلوماسية في طهران -في إطار مظاهرات ضد إعدام السعودية رجل الدين البارز نمر النمر.
لابد أن ينعكس السلام الهش بين الكوريتين على أرض الملعب، هل تتفق مع هذا؟ ليس إلى حد بعيد، كما يبدو.
ليس غريبا على الكوريين أن يشجع كل بلد فريق جارته. وقد حظي لاعبون من أمثال الكوري الشمالي يونغ تاي-سي بشعبية كبرى في كوريا الجنوبية.
واحتفلت الصحافة الكورية الشمالية بنجاح استضافة كوريا الجنوبية مع اليابان لبطولة كأس العالم 2002 وبوصول فريقها لنصف النهائي، كأول فريق آسيوي يحقق ذلك.
وفي ظل شعور مشترك بالوحدة الكورية، لا تزال الغالبية على الجانبين الشمالي والجنوبي لشبه الجزيرة تحبّذ عودة الوحدة، وإنْ كان الدعم الشعبي لهذا الاتحاد قد تراجع في الشطر الجنوبي من 90 في المئة تقريبا عام 1969 إلى 58 في المئة العام الماضي، طبقا لاستطلاعات رأي أجراها المعهد الكوري للوحدة الوطنية.
لكن بعض المشاحنات طفت على السطح؛ ففي عام 2008 تغيّر مكان إقامة المباراة المؤهلة لكأس العالم بين الكوريتين من بيونغيانغ إلى شانغهاي بعد أن رفض النظام الكوري الشمالي السماح بعزف النشيد الوطني أو رفع العلم الكوري الجنوبي في ملعب كيم إل سونغ.
وبعد ذلك بعام، وفي سول، عزت السلطات الكورية الشمالية الهزيمة 1-0 إلى خطة مزعومة لتسميم لاعبيها.
جدير بالذكر أن فريقي الكوريتين مشاركان في بطولة كأس آسيا ليس بدعًا "إعادة تحديد مكان" الفرق الدولية لكرة القدم. وقد نُقل فريق استراليا إلى الاتحاد الآسيوي لكرة القدم عام 2006 سعيًا لمباريات أكثر تنافسية من تلك التي تشهدها مباريات كأس أوقيانوسيا، وكان منتخب استراليا قد هزم فريق منتخب جزر الساموا الأمريكية (31-0)، على سبيل المثال لا أكثر.
وستشارك دولة قطر التي ستستضيف كأس العالم 2022 في بطولة كوبا أمريكا (بطولة أمريكا الجنوبية الدولية) في إطار برنامج تستهدف من خلاله أن يكستب فريقها الوطني مزيدًا من الخبرة.
أما بالنسبة لوضع إسرائيل في كأس الأمم الأوروبية، فإن الأمر لا يزال أكثر تعقيدا منذ عام 1994.
فعلى الرغم من انضمامها أصلا إلى كأس الأمم الأوروبية، فقد واجهت الدولة اليهودية مقاطعة من بلدان مسلمة من أول يوم.
وفي عام 1958 فازت إسرائيل في المباريات المؤهلة لكأس العالم عن المنطقة دون أن تلعب مباراة واحدة - ما أجبر الفيفا على تنظيم مباراة فاصلة بين فريقي ويلز وإسرائيل خسرها الأخير.
وفي عام 1964، استضافت إسرائيل بطولة كأس آسيا وفازت بها، لكن 11 فريقا انسحبوا من البطولة.
وقد تأهلت إسرائيل كبلد آسيوي لنهائيات كأس العالم عام 1970، ولم تكد تنافس في دورة الألعاب الآسيوية عام 1974 بإيران حتى احتدت التوترات في الشرق الأوسط، مما قاد إلى استبعادها من بطولة كأس آسيا 1974.
وفي الفترة الممتدة من 1982 إلى 1994، شاركت إسرائيل في بطولات دولية بأوروبا وأوقيانوسيا قبل أن تمسي رسميا عضوا بالاتحاد الأوروبي لكرة القدم - وتشارك أندية إسرائيل في مسابقات دوري أبطال أوروبا.
على الرغم من استضافة كأس العالم 2002 سويا، إلا أن العلاقة بين اليابان وكوريا الجنوبية معقدة نوعا ما.
وقد ترك الحكم الياباني لشبه الجزيرة الكورية زهاء 35 عاما (1910-1945) كثيرا من الضغينة، ولا تزال بين الدولتين قضايا مثيرة للجدل كمسائل تتعلق بالعمالة القسرية لمئات الآلاف من الرجال والنساء الكوريين أثناء فترة الاحتلال.
وفي عام 1954، استبقت حكومة كوريا الجنوبية مباراة مؤهلة لكأس العالم بقرار يحظر دخول اليابانيين إلى بلادها، ونُقل عن الرئيس سيغمان ري حينها القول: "لا يزال الوقت مبكرا جدا على ذلك".
وفي النهاية، تراجعت سول عن التمسك بحق اللعب أمام مشجعين كوريين، وأقيمت المبارتان على أرض يابانية.
وكسب الكوريون المباراة 7-3 ، ومن غير الواضح كيف أثمرت تهديدات الرئيس ري للاعبين "بعدم التجرؤ على الرجوع حال الخسارة".
وفي عام 2012 عاود الكوريون الفوز على جيرانهم، وهذه المرة في مباراة تحديد الفائز بالميدالية البرونزية في أوليمبياد لندن.
وعرض لاعب خط الوسط، بارك يونغ-وو، لافتة مكتوب عليها "دوكدو إقليمنا"، في إشارة إلى جزيرة صغيرة متنازع عليها تطلق عليها اليابان اسم "تاكيشيما" - مما حدا باللجنة الأوليمبية الدولية إلى سحب الميدالية منه.
وبعد مرور عام، حظيت لافتة رفعها مشجعون محليون تقول: "لا مستقبل لجيل نسي التاريخ" باهتمام واسع غطى على فوز اليابان 2-1 بكأس شرق آسيا.
وقد سلكت كوريا الشمالية، على نحو غريب، مسلكا مختلفا؛ فقد مثّل البلاد عددٌ من اللاعبين المولودين في اليابان، ومن بينهم (يونغ تاي-سي)، الذي قاد كوريا الشمالية إلى كأس العالم 2010 - في المرة الثانية التي تشارك فيها البلاد بالبطولة.
ثمة مشكلة أخرى تضمها السعودية بين طياتها: ففي 17 يناير/كانون الثاني الجاري تواجه السعودية قطر فيما يمكن اعتبارها مباراة حاسمة في مجموعتهما.
وهذه هي المرة الأولى التي يلتقي فيها الفريقان منذ الأزمة الدبلوماسية التي أدت إلى قطع السعودية ودول أخرى علاقاتها مع قطر منذ أكثر من عام ونصف.
وفي محاولة لتخفيف حدة التوتر، قال المنسق الإعلامي للمنتخب القطري، علي الصلات، "في النهاية، للرياضة رسالة سلام. وعليه، فهذا ما نسعى لتقديمه، ونحن نأمل أن نمثل بلدنا على نحو جيد أثناء المنافسة."
إلا أن جدلا ثار عندما مُنع نائب رئيس الاتحاد القطري وعضو اللجنة التنفيذية بالاتحاد الآسيوي لكرة القدم، سعود المهندي، من دخول الإمارات العربية المتحدة
Subscribe to:
Posts (Atom)